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भूपेंद्र यादव का कॉलम: अब भारत के वातावरण में अच्छी तरह से घुल-मिल चुके हैं चीते

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भूपेंद्र यादव का कॉलम:  अब भारत के वातावरण में अच्छी तरह से घुल-मिल चुके हैं चीते

भूपेंद्र यादव का कॉलम: अब भारत के वातावरण में अच्छी तरह से घुल-मिल चुके हैं चीते

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12 घंटे पहले

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भूपेंद्र यादव केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री

भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक अत्यंत सुखद सूचना सामने आई है। चीता पुनर्वास कार्यक्रम के तहत भारतीय जमीन पर जन्म लेने वाली पहली चीता मुखी ने मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उ‌द्यान में पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है। आज जब हम अंतरराष्ट्रीय चीता दिवस (4 दिसम्बर) मना रहे हैं, यह सुखद समाचार उन सात दशकों के खालीपन को भरता है, जब भारत से चीते विलुप्त हो गए थे।

साथ ही यह भी दर्शाता है कि अगर अच्छी योजना के साथ वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए और संरक्षण के प्रयास लगातार हों, तो चीते भारत में सफलतापूर्वक प्रजनन करते हुए रह सकते हैं। इन पांच शावकों का आना नए उत्साह का संचार करता है। विश्वास दृढ़ होता है कि भारत में एक आत्मनिर्भर, आनुवंशिक रूप से सक्षम चीता आबादी बनाना अब दूर का सपना नहीं, बल्कि साकार होती वास्तविकता है।

कभी चीते भारतीय उपमहाद्वीप के विस्तृत क्षेत्रों में फैले हुए थे, जिनमें सवाना, झाड़-झंखाड़ वाले क्षेत्र और शुष्क वन-घासभूमि के मिश्रित परिदृश्य शामिल थे। लेकिन पारिस्थितिक परिवर्तनों के कारण 20वीं सदी के मध्य तक भारत से चीता गुम होता गया और 1952 में इसे औपचारिक रूप से देश में विलुप्त घोषित कर दिया गया।

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बिग कैट की इस शानदार प्रजाति के पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक महत्व को समझते हुए 2022 में प्रोजेक्ट चीता के तहत एक साहसिक और अभूतपूर्व पहल का आरंभ किया गया। 17 सितंबर 2022 को दुनिया के पहले इंटरकॉन्टिनेंटल वाइल्ड-टु-वाइल्ड स्थानांतरण मिशन के तहत नामीबिया से लाए गए आठ अफ्रीकी चीतों (पांच मादा, तीन नर) को कूनो में छोड़ा गया। फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीतों को लाया गया, जिससे देश में चीतों की मूल आबादी को और मजबूती मिली।

इस पहल के पीछे विजन यह था कि धीरे-धीरे एक मजबूत, प्रजनन-सक्षम चीता आबादी विकसित की जाए, जो देश में घासभूमि और खुले वनों के पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करे, इको सिस्टम को समृद्ध बनाए और वन्यजीवन सहित सांस्कृतिक तथा सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान करे।

किसी भी अग्रणी वन्यजीव के पुनर्वास प्रयास की तरह इस पहल के समक्ष भी प्रारंभिक वर्षों में अनेक चुनौतियां आईं। अफ्रीका से भारत में स्थानांतरण के साथ जलवायु, आवास की उपयुक्तता, शिकार की उपलब्धता, बीमारी के जोखिम और मृत्यु दर जैसे मुद्दे उठे। शुरुआती रिपोर्टों में कुछ मौतों का उल्लेख भी हुआ और आलोचकों ने इसकी दीर्घकालीन व्यवहार्यता पर सवाल उठाए।

लेकिन इन सवालों से इतर मौजूदा आंकड़े अत्यंत उत्साहजनक हैं। 2023 से 2025 के बीच कूनो में वयस्क चीतों के जीवित रहने की दर पहले साल लगभग 70% और दूसरे साल 85.7% रही। शावकों में यह दर 66.7% रही। 2025 के अंत तक भारत में 32 चीते मौजूद हैं, जिनमें से 21 शावक यहीं जन्मे हैं।

यह बताता है कि चीतों की आबादी धीरे-धीरे बढ़ते हुए स्थिर हो रही है। भारत में जन्मी एक मादा चीता द्वारा पांच शावकों को जन्म देना इस बात का सशक्त प्रमाण है कि चीते भारतीय वातावरण में घुल-मिल कर अच्छी तरह बढ़ भी रहे हैं।

चीता को प्राचीन भारतीय ग्रंथों में संस्कृत से व्युत्पन्न अर्थ में चित्तेदार बताया गया है। यह कभी भारत की प्राकृतिक विरासत का अभिन्न अंग था। इसका विलुप्त होना केवल पारिस्थितिक ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक हानि भी थी।

ऐसे में, यह पहल भारत की खोई हुई विरासत को पुनर्जीवित करने, पारिस्थितिक संतुलन पुनर्स्थापित करने और वैश्विक जैव-विविधता के प्रति एक जिम्मेदार संरक्षक के रूप में कार्य करने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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