साल में एक बार खुलते हैं बांधवधीश के द्वार: टाइगर रिजर्व के घने जंगल में 13 किमी पैदल पहुंचते हैं, जन्माष्टमी पर 10 हजार श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद – Umaria News

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साल में एक बार खुलते हैं बांधवधीश के द्वार:  टाइगर रिजर्व के घने जंगल में 13 किमी पैदल पहुंचते हैं, जन्माष्टमी पर 10 हजार श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद – Umaria News

साल में एक बार खुलते हैं बांधवधीश के द्वार: टाइगर रिजर्व के घने जंगल में 13 किमी पैदल पहुंचते हैं, जन्माष्टमी पर 10 हजार श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद – Umaria News

उमरिया बाघों के लिए ही नहीं मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां ताला जोन स्थित किले पर भगवान राम का मंदिर है। यहां भगवान राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां विराजमान हैं। इन्हें बांधवधीश के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर सिर्फ साल में एक दिन कृष्ण जन्म

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मंदिर में सबसे पहले रीवा राजघराने के राजा दिव्यराज सिंह भगवान की पूजा करते हैं। इसके बाद ही आम श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश दिया जाता है।

टाइगर रिजर्व के उपसंचालक विवेक सिंह ने बताया कि इस साल करीब 10 से 12 हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। यहां श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त इंतजाम किए हैं। सुबह 8 से शाम 5 बजे तक मंदिर का समय निर्धारित किया गया है। सुरक्षा के लिए 500 से अधिक कर्मचारियाें के साथ हाथी दल और गाड़ियां भी लगातार गश्त पर हैं।

BTR के ताला जोन में स्थित प्राचीन राम मंदिर पर जन्माष्टमी के दिन कई श्रद्धालु पहुंचते हैं।

रामजी का कृष्ण और सीताजी का राधा रानी के रूप में पूजन

इसका इतिहास रामायणकाल से जुड़ा है। बताया जाता है कि भगवान राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को यह किला उपहार में दिया था। बांधव यानी भाई और गढ़ यानी किला, इसलिए इसका नाम बांधवगढ़ पड़ गया। जाता है कि लक्ष्मण ने इस पहाड़ी की चोटी से इस क्षेत्र की रक्षा की थी।

रिटायर्ड आईएफएस आरएस सिकरवार बताते हैं कि मंदिर कल्चुरी कालीन है। यहां जब कल्चुरी राजवंश का शासन था। कल्चुरी शासक ने अपनी पुत्री पद्मकुंवरि का विवाह बघेल शासक के साथ कर दिया। तब किला बघेल शासकों को मिला। कालांतर में मंदिर जीर्णशीर्ण होने लगा। इसके बाद इसके पुन: निर्माण का निर्णय लिया गया। यहां राम, जानकी और लक्ष्मण जी की मूर्तियां हैं।

आरएस सिकरवार कहते हैं कि इतिहास के मुताबिक जब भगवान श्रीराम चित्रकूट दंडकारण्य के लिए जा रहे थे, तब इस किले को लक्ष्मण जी ने भगवान राम को दिखाया। चूंकि वो वनवास में थे, इसलिए सीता जी को वापस लाने के बाद भगवान राम जब राजा बने, तो उन्होंने ये किला अपने बंधु लक्ष्मण को दे दिया।

टाइगर रिजर्व बनने के बाद वन्य प्राणी प्रबंधन को सौंपा

सिकरवार बताते हैं कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व बन जाने के बाद किले को राज्य शासन के जरिए बांधवगढ़ वन्य प्राणी प्रबंधन को सौंप दिया गया। करीब 35 साल पूर्व उस समय सहमति पत्र पर महराज रीवा और मध्यप्रदेश शासन की ओर से प्रमुख सचिव वन विभाग के मध्य एक लिखित संधि हुई। इसके तहत जन्माष्टमी के दिन मंदिर जन सामान्य के लिए उपलब्ध रहेगा।

मंदिर पहुंचने के लिए 13 किमी चलना पड़ता है पैदल

भगवान बांधवाधीश मंदिर तक पहुंचने के घने जंगल में 13 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। पहला पड़ाव शेष शैय्या का पड़ता है, जहां भगवान विष्णु की विष्णु की लेटी हुई विशाल पत्थर की अद्भुत मूर्ति है, जिसे शेष शैय्या के नाम से जाना जाता है। यहां से दर्शन कर श्रद्धालु जन्माष्टमी के दिन मंदिर में पहुंचते हैं।

स्थानीय निवासी नरेश सिंह गुढ्ढा ने बताया के मंदिर पहुंचने के बाद शांति मिलती है। हर जन्माष्टमी पर दर्शन करने यहां आता हूं। मंदिर के आस पास भगवान के 12 अवतार भी देखने को मिलते हैं। मंदिर के पास 12 तालाब भी हैं। जिनका अपना अलग रहस्य हैं। इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

रीवा के महाराज को पहले पूजा का अधिकार

मंदिर में पहली पूजा जन्माष्टमी के दिन पहली पूजा करने का अधिकार महराज रीवा को है। सामान्यत: मंदिर जन सामान्य के लिए जन्माष्टमी को ही खुलता है। बाकी दिनों में पूजा के लिए टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने पुजारी की व्यवस्था की है। वह मंदिर परिसर में रहकर भगवान की सेवा करता है। यह भारत वर्ष में एक मात्र ऐतिहासिक मंदिर है, जहां रामचंद्र जी की कृष्ण के रूप में और सीता जी राधा रानी के रूप में पूजा होती है।

बताया जाता है कि पहले मंदिर साल में दो बार रामनवमी और जन्माष्टमी के दिन खुलता था। पिछले करीब 15 साल से साल में एक ही बार खुलता है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए शैय्या पर लेटे हुए भगवान विष्णु का पहला पड़ाव पड़ता है।

पुजारी बोले– रात 12 बजे मनाते हैं उत्सव

मंदिर के पुजारी संजय गौतम ने बताया कि किले की सीमा रेखा पर दीवार नहीं है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में मधा वंशियों ने सुरक्षा की दृष्टि से इसके लिए प्रवेश द्वार बनवाया। उसके बाद ही बांधवगढ़ किले में बस्ती बसाई गई। किला कल्चुरी नरेशों के अधीन आया। मंदिर में बने अधिकांश संरचनाएं कल्चुरी कालीन हैं। मंदिर के नीचे बनी गुफाएं बुद्ध कालीन हैं, जो बुद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए बनाई गई थी।

पुजारी संजय गौतम बताते हैं कि मंदिर में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण मूर्ति है। इनका सुबह अभिषेक 6 बजे होता है। उन्हें विशेष रुप से तैयार करते हैं। कपड़े कटनी से आते हैं। मंदिर पट खोलते हैं। रात 8 बजे रात्रि कालीन आरती के बाद पट बंद कर दिए जाते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन विशेष पूजा कृष्ण जन्म उत्सव रात 12 बजे मनाते हैं।

बीटीआर प्रबंधन ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए भी विशेष प्रबंध किए हैं।

500 से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारी किए तैनात

उपसंचालक विवेक सिंह ने बताया कि टाइगर रिजर्व प्रबंधन, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। 500 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी तैनात किए गए हैं। इसके अलावा हाथी दल और गश्ती वाहन भी लगाए गए हैं, जो वन क्षेत्र में गश्त के साथ वन्य प्राणियों की निगरानी कर रहे हैं।

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