नई दिल्लीः भारत में ऐसी कई बातें हैं, जिनसे दुनियाभर के देश सीख ले सकते हैं. लेकिन यहां हम एक ऐसी खूबी के बारे में बता रहे हैं, जिसे अगर दुनिया के अन्य देश भी अपना लें तो हम अपनी प्रकृति को काफी हद तक बचा सकते हैं. ये खूबी है शाकाहार की. एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रत्येक व्यक्ति सालाना औसतन करीब 3 किलो मीट खाता है. वहीं रूस में यह आंकड़ा 76 किलो और अमेरिका में प्रति व्यक्ति सालाना मीट की खपत 127 किलो है.
मांसाहार का बढ़ता चलन पैदा कर रहा गंभीर संकट आजकल दुनिया भर में मांसाहार का बढ़ता चलन समस्या को और गंभीर बना रहा है. डायचे वेले की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 1960 में इस दुनिया में प्रतिव्यक्ति मीट की सालाना खपत 23 किलो थी, जो आज बढ़कर प्रति व्यक्ति सालाना 46 किलो हो गई है. जो कि 1960 के मुकाबले दोगुना है. यकीनन आबादी भी बढ़ी है लेकिन मांसाहार की खपत बढ़ने की कीमत पूरी पृथ्वी को चुकानी पड़ रही है.
क्या हो रहा मांसाहार का दुनिया पर असर? मीट की मांग बढ़ने के कारण उतने ही ज्यादा मवेशी पाले जाएंगे. ज्यादा मवेशी मतलब उनके चारे के लिए और जमीन की जरूरत. रिपोर्ट के अनुसार, इस दुनिया की कुल खेती की जमीन का 71 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ मवेशियों का चारा उगाने में ही इस्तेमाल हो रहा है. चारे के लिए बड़ी संख्या में जंगल काटे जा रहे हैं. जिसके चलते जंगली जानवरों के बसेरे खत्म हो रहे हैं, जो कि इंसानों की बस्तियों का रुख कर रहे हैं. जिससे जानवरों और इंसानों का टकराव बढ़ रहा है. साथ ही जानवरों से कई गंभीर बीमारियां भी इंसानों को मिल रही हैं.
जलसंकट गहराने का खतरा इतना ही नहीं मीट जैसे बीफ, मटन और चिकन को पालने में बड़ी संख्या में पानी का इस्तेमाल होता है, जो कि खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली पानी की तुलना में बहुत ज्यादा हैं. रिपोर्ट के अनुसार, एक किलो बीफ तैयार होने में सालाना 15 हजार लीटर से ज्यादा पानी इस्तेमाल होता है. वहीं एक किलो चावल के उत्पादन में सालाना 2.5 हजार लीटर पानी इस्तेमाल होता है. ऐसे में अंतर को साफ समझा जा सकता है. जब दुनिया में पानी की लगातार कमी हो रही है, ऐसे में मीट पर इतना पानी खर्च होना हमारे लिए खतरे की घंटी है.
मेडिकल खर्च के एक ट्रिलियन डॉलर बच सकते हैं अगर इस धरती के सभी लोग शाकाहार अपना लें तो साल 2050 तक दुनिया भर में मेडिकल खर्च के करीब एक ट्रिलियन डॉलर बचाए जा सकते हैं. वहीं ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को काफी कम किया जा सकता है, जिससे धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है. इसके अलावा मीट में बहुत ज्यादा कैलोरी होती है, जो सेहत के लिए हानिकारक होती है और कई बीमारियों का कारण बनती है. एक स्टडी के मुताबिक अगर पूरी दुनिया के लोग शाकाहार अपना लें तो इससे पर्यावरण और आर्थिक तौर पर बहुत फायदा होगा और इससे दुनिया में बड़ा बदलाव आ सकता है.
भारत से सीख सकती है दुनिया अच्छी बात ये है कि मीट से सेहत को होने वाले नुकसान के चलते दुनिया में शाकाहारी लोगों की संख्या भी बढ़ रही है. हालांकि अभी दुनिया में शाकाहारी लोगों का आंकड़ा बेहद कम है. हमारे लिए गर्व की बात ये है कि दुनिया के मुकाबले हमारे देश में मीट की खपत काफी कम है. ऐसे में दुनिया हमसे शाकाहार जीवन जीने की कला सीख सकती है. जो ना सिर्फ उनकी सेहत के लिए बल्कि इस प्रकृति के लिए भी फायदेमंद साबित होगा.
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