155 साल पुरानी ब्रिटिशकालीन रेल की आखिरी सफर, भावुक हुए यात्री

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हमें बहुत दुख है कि मेरी हरी झंडी पर ट्रेन आगे तो बढ़ गई, लेकिन मेरा मन भारी है। आज आखिरी बार मैंने इस ट्रेन को हरी झंडी दी। रेलवे बोर्ड की लाल झंडी ने इसे हमेशा के लिए रोक दिया। यह दर्द उन दो गार्ड के थे, जो आखिरी बार ‘श्रमिक ट्रेन’ को जमालपुर से सुल्तानगंज व कजरा तक ले गए। यह ट्रेन भागलपुर के जमालपुर से कजरा और जमालपुर से सुलतांगज के बीच चलाई जाती है।

बिहार भागलपुर के कजरा तक ट्रेन ले जाने वाले चालक महाराज अरुण कुमार ने कहा, “मेरा बचपन इस ट्रेन पर बीता है। बड़ा हुआ तो इसी ट्रेन से सफर किया। अब नौकरी के दो साल बचे हैं। इस ट्रेन से आखिरी बार भी सफर कर रहा हूं।” दरअसल, मंगलवार को 155 सालों का सफर रुक गया। दोनों श्रमिक ट्रेन के अंतिम फेरे पर जमालपुर कारखाना के तमाम कर्मी मायूस थे।

मुख्य कारखाना प्रबंधक एके पांडे ने बताया, “रिकार्ड के मुताबिक 8 फरवरी, 1862 को पहली बार यह ट्रेन चलाई गई थी। जमालपुर में एशिया प्रसिद्ध रेल इंजन कारखाना की स्थापना के बाद अंग्रेजों ने कारखाना कर्मियों को ड्यूटी पर आने और घर लौटने के लिए दो रेल श्रमिक ट्रेन चलाई थी। जमालपुर से कजरा और जमालपुर से सुल्तानगंज तक रविवार छोड़कर सभी दिन यह ट्रेन चलती थी।”

क्या कहते हैं स्टेशन प्रबंधक

सुलतानगंज के स्टेशन प्रबंधक इंदु कुमार ने बताया, “श्रमिकों की संख्या काफी घट गयी। रेल विभाग को राजस्व की हानि हो रही थी। मालदा डिवीजन की बाबू गाड़ी का परिचालन बंद करने का निर्णय है। इस ट्रेन को बंद कर किए जाने से यात्रियों को परेशानी नहीं होगी।”

ड्राइवर और गार्ड हुए इमोशनल, बोले- आज अच्छा नहीं लग रहा

श्रमिक ट्रेन के ड्राइवर संजय कुमार मंडल और गार्ड राकेश कुमार अंतिम बार श्रमिक ट्रेन चला रहे थे। दोनों ने कहा- फैसला बोर्ड का है, क्यों और कैसे का जवाब तो नहीं दे सकते, लेकिन आज अच्छा नहीं लग रहा है। संजय ने बताया 2002 से मैं इस ट्रेन को चला रहा हूं। आज लग रहा है कि जमालपुर रेल कारखाना के कर्मचारियों की एक धरोहर खत्म हो रही है।

जानिए ट्रेन बंद करने के पीछे रेलवे बोर्ड का गणित

रेलवे इस ट्रेन में सफर के लिए 1996 से 75 रुपए यात्री किराया लेती थी। 2008 में करीब 1200 रुपए रेलकर्मियों की सेलरी से काटा जाने लगा। अभी 1890 रुपए काटे जा रहे थे। रेलकर्मियों ने इसका विरोध किया। सालाना खर्च में रेलवे को प्रति वर्ष 2.50 करोड़ का घाटा था।

ब्रिटिश काल में इस तरह पड़ा ट्रेन का नाम

आपको बता दें कि जमालपुर में रेलवे का एशिया प्रसिद्ध कारखाना है। यहां डीजल इंजन का निर्माण और मरम्मत का काम होता है। इस कारखाने को यह 8 फरवरी 1862 में अंग्रेजों ने शुरू किया था। जानकार बताते हैं कि यहां पर ब्रिटिश शासन में पहले तोपों का निर्माण किया जाता था। यह आयुध कारखाना था। बाद में यहां पर रेलवे इंजन का निर्माण किया जाने लगा। कारखाने के रूप में अंग्रेजों ने ही बदलाव किया था। उस समय यहां पर काम करने वाले श्रमिकों की सहूलियत के लिए दो रूटों पर ट्रेनें चलाई गई थीं। जो अभी भी चलती हैं। इस कारण ही दोनों ट्रेनों का नाम श्रमिक ट्रेन पड़ गया।

श्रमिक ट्रेन, कुली ट्रेन और बाबूट्रेन भी

श्रमिक ट्रेन को लोग कुली ट्रेन भी कहते हैं। लेकिन रेलकर्मी इसे ‘बाबू’ ट्रेन भी कहते हैं। कारण यह कि यह ट्रेन जब कारखाना वापस आती थी तो रास्ते में एक्सप्रेस ट्रेन भी पास देती थी। वजह यह कि अगर यह ट्रेन लेट होती तो कारखाना का काम बाधित होता। रेलकर्मी बताते हैं कि अब भी अगर यह ट्रेन कारखाना आने में लेट होती थी तो कारखाना कर्मियों की हाजिरी नहीं कटती थी। यह माना जाता था कि श्रमिक ट्रेन लेट आयी इसलिए लेट हुआ।

 

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