15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा, लंदन स्टॉक एक्सचेंज में कंपनी की करायी लिस्टिंग, पढ़िए अनिल अग्रवाल का Bihar To London सफर

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15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा, लंदन स्टॉक एक्सचेंज में कंपनी की करायी लिस्टिंग, पढ़िए अनिल अग्रवाल का Bihar To London सफर

पटना: अमूमन जब भी हम किसी उद्योगपति के बारे में पढ़ते हैं, या उसके बार में जानना चाहते हैं तो मन में कई सवाल उठते हैं। जैसे कि उसकी नेटवर्थ कितनी होगी? उसके पास कौन-कौन सी गाड़ियां होंगी। रहन सहन कैसा होगा? लेकिन कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपनी किस्मत खुद लिखते हैं। उन्हीं में से एक हैं वेदांता समूह के प्रमुख अनिल अग्रवाल। बिहार से लंदन वाया मुंबई का सफर अनिल अग्रवाल ने कैसे तय किया, उन्होंने खुद बताया। अनिल अग्रवाल ने ट्विटर पर बताया कि कैसे वह 2003 में अपनी कंपनी वेदांता को लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कराने वाले पहले भारतीय बने। यही नहीं, अग्रवाल ने ये भी बताया कि उन्होंने ‘रातोंरात’ लंदन जाने का फैसला क्यों लिया।

दरअसल, 12 जुलाई को वेदांता समूह के प्रमुख अनिल अग्रवाल ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा कि आप में से अधिकांश लोग मुझे 2003 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज में अपनी कंपनी को सूचीबद्ध कराने वाले पहले भारतीय के रूप में जानते हैं। इसकी शुरुआत कैसे हुई… पूरी कहानी के लिए नीचे पढ़ें …

वेदांता समूह के प्रमुख अनिल अग्रवाल ने बताया कि उस वक्त लंदन स्टॉक एक्सचेंज ( LSE ) में वैश्विक कंपनियां सूचीबद्ध हो रही थीं। और मैं उनमें से एक बनना चाहता था। वास्तव में, मैंने सबसे बड़ा होने का सपना देखा था, इसलिए लंदन जाने का फैसला किया।

अपनी पत्नी को अपना सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम बताते हुए अनिल अग्रवाल ने बताया कि मैंने किरण से कहा कि हम लंदन जा रहे हैं। तब वह हमारी बेटी प्रिया के स्कूल गई और उनसे 6 महीने की छुट्टी मांगी, क्योंकि उसे यकीन था कि हम तब तक वापस आ जाएंगे। उसने अब भी बिना किसी संदेह के सब कुछ व्यवस्थित किया। अनिल अग्रवाल ने बताया कि मैंने ज्यादा पैक नहीं किया लेकिन अपनी मां के पराठे और बाबूजी के शॉल को, उनके आशीर्वाद के रूप में ले जाने में कामयाब रहा।

लंबे समय के बाद महसूस हुआ डर
लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरने के बाद के अपने अनुभव को याद करते हुए अनिल अग्रवाल ने बताया कि हवाई अड्डे से बाहर निकले के बाद यह एक अलग दुनिया की तरह लगा, अलग-अलग लहजे वाले विदेशी लोग, ठंड और बरसात का मौसम, बड़ी सफेद इमारतें। मुझे हर किसी की याद दिला दी, जिन्होंने मुझसे कहा था कि छोटी चिड़िया बड़े आसमान में नहीं उड़ती। मुझे लंबे समय के बाद डर महसूस हुआ।

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उन्होंने बताया कि लंदन पहुंचने पर मेरे पास बहुत कुछ तो नहीं था, लेकिन मेरे पास एक चीज थी। मेरे मार्गदर्शक, मेरे माता-पिता का विश्वास और आशीर्वाद। इसलिए मैं यहां अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जीवन की इस नई यात्रा का आनंद ले रहा था। पिछले महीने लंदन में ऑक्सफोर्ड यूनियन में छात्रों के साथ बातचीत में अनिल अग्रवाल ने उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि उन्होंने अपनी उद्यमशीलता की यात्रा से महत्वपूर्ण सीख साझा की।

भाग्य बहादूर का साथ देता है

अनिल अग्रवाल कहते हैं कि बिहार से लंदन वाया मुंबई तक की सफर कई सीखों, कड़ी मेहनत और आत्म विश्वास से भरी रही है। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनियन में छात्रों से बता करते हुए कहा कि निडर बने, क्योंकि भाग्य बहादुर का साथ देता है। विनम्र रहो क्योंकि विकास तब होता है तब आप अपने आप को अंदर की ओर देखते हो। लचीला बनो क्योंकि मेहनत के अलावा अपके पास कोई और दूसरा विकल्प नहीं है। उन्होंने छात्रों से जोर देकर कहा कि आज की तारीख में युवाओं और तकनीक के मिलन से दुनिया को आगे की ओर ले जाएगा।

15 साल की उम्र में छोड़ दिया था घर
बिहार की राजधानी पटना में जन्मे और पले-बढ़े अनिल अग्रवाल मिलर हाई स्कूल से पढ़ाई की। बताया जाता है कि वह अपने पिता के बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए 15 साल की उम्र में ही स्कूल छोड़ दिया था और बिहार से पहली बार बाहर निकले। पहले पुणे, फिर मुंबई आ गए। बताया जाता है कि उन्होंने अपना करियर स्क्रैप डीलर के तौर पर शुरू किया। इसके बाद मेटल और तेल और गैस के कारोबार से जुड़ गए। साल 1970 में सेक्रैप मेटल का काम शुरू किया और 1976 में शैमशर स्टेर्लिंग कॉर्पोरेशन को खरीदा।

दान कर दिए थे 21 हजार करोड़
वेदांता समूह के मालिक अनिल अग्रवाल ने लंदन स्टॉक एक्सचेंज में कंपनी की लिस्टिंग के 10 साल होने पर अपनी 75 फीसदी संपत्ति यानी 21 हजार करोड़ दान कर दी थी। उन्होंने इस दान के पीछे कहा था कि पैसा ही सब कुछ नहीं है। समाज ने जो दिया, उसे लौटाना भी चाहिए।

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