हिन्दी सिनेमा के ऐसे 10 डायलॉग जिसे सुनकर आपकी हसी नहीं रुक पाएगी

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हिन्दी फ़िल्मों में हिरो, हिरोईन और विलेन के डायलॉग बोलने और सुनने का अपना ही एक मज़ा होता है। कहा जाता है की हिन्दी की जन्म फ़िल्मों में डायलॉग नहीं होता है वह सिनेमाई पर्दे पर कोई धमाल नहीं मचा पाती है। बहुत सी ऐसी फ़िल्में होती है जिनकी कहानी में दम नहीं होता है लेकिन वह अपने डायलॉग के द्रवारा लोगों का दिन जीतकर खुद को सफ़ल फ़िल्मों में शामिल कर देती है।

अब प्यार न हुआ तुम्हारा, यूपीएससी का एग्जाम हो गया है। दस साल से क्लियर ही नहीं हो रहा है।

फ़िल्म : रांझणा

डायलॉग लेखक : मोहम्मद जशीन अयूब

जिस स्कूल में तूने ये सब सीखा है ना…उसका हेडमास्टर आज भी मुझसे ट्यूशन लेता है।

फ़िल्म वांटेड

डायलॉग सलमान ख़ान

पढ़ोगे लिखोगे तो होगा ख़राब… खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नवाब

फ़िल्म आदमी खिलौना है

डायलॉग लक्ष्मीकांत बेंद्रे

टीचर्स सिर्फ़ रुल्स सिखाता है…. लेकिन विनर्स, विनर्स रुल्स बनाते है।

फ़िल्म : स्टूडेंट ऑफ द ईयर

डायलॉग : राम कपूर

गुरु को बड़ा उसका शिष्य बनाता है
फ़िल्म : शुटआउट एट वडाला

डायलॉग : जॉन अब्राहम

खीचे हुए कान से मिला हुआ ज्ञान…. हमेशा याद रहता है

फ़िल्म : राजानटवर लाल

डायलॉग : परेश रावल

एग्जाम के सवाल का जवाब तो हर कोई देता है…. लकिन असली हीरो वो है जो ज़िंदगी का जवाब दें।

फ़िल्म : डेंजरस ख़िलाड़ी

डायलॉग : अल्लू अर्जुन

इंटेलिजेंस और परफॉर्मेंस…. बैकग्राउंड का मोहताज नहीं होता

फ़िल्म : आरक्षण

डायलॉग : सैफ़ अली ख़ान

गुरु सिर्फ़ ज्ञान ही नहीं देता…. बल्कि अज्ञान भी दूर करता है

फ़िल्म : शिरडी के साई बाबा

डायलॉग : सुधीर दलवी

लिखने पढ़ना तो स्कूल में सिखाया जाता है… लेकिन इंसानियत स्कूल में नहीं संस्कारों से आती है

फ़िल्म : रामपुर का लक्ष्मण

डायलॉग  : सुलोचन लटकर