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लाश के 35 टुकड़े, पत्नी को प्रेशर कुकर में उबाला: कसाई बने पति-पत्नी-बॉयफ्रेंड; सेक्स, नफरत या बीमारी, क्या है वजह

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लाश के 35 टुकड़े, पत्नी को प्रेशर कुकर में उबाला:  कसाई बने पति-पत्नी-बॉयफ्रेंड; सेक्स, नफरत या बीमारी, क्या है वजह

लाश के 35 टुकड़े, पत्नी को प्रेशर कुकर में उबाला: कसाई बने पति-पत्नी-बॉयफ्रेंड; सेक्स, नफरत या बीमारी, क्या है वजह

तारीख: 17 दिसंबर, जगह: यूपी का गाजियाबाद राज नगर एक्सटेंशन में रहने वाली दीपशिखा किरायेदार अजय गुप्ता के यहां किराया मांगने पहुंचीं। उनका करीब 90 हजार रुपए किराया बाकी था। इस पर पहले झगड़ा भी हो चुका था। इसी गुस्से में अजय और उसकी पत्नी आकृति ने दीपशि

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ये अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ साल में मर्डर के बाद लाश के टुकड़े करने का पैटर्न सामने आया है। मार्च, 2025 में मेरठ के रहने वाले सौरभ राजपूत की हत्या कर दी गई। आरोप सौरभ की पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल पर है। दोनों ने डेड बॉडी के 20 टुकड़े किए और ड्रम में डालकर ऊपर से सीमेंट भर दिया।

दिल्ली में मई 2022 में हुआ श्रद्धा वालकर हत्याकांड भी इतना ही भयानक था। लिव इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला ने श्रद्धा को गला दबाकर मार दिया, फिर 10 घंटे तक बाथरूम में शावर चलाकर उसकी लाश के टुकड़े करता रहा। फिर 35 टुकड़ों को धोया और पॉलिथीन में भरकर फ्रिज में रख दिया। आरोप ये भी है कि आफताब 18 दिन तक महरौली के जंगल में टुकड़े फेंकता रहा।

इसी तरह तेलंगाना में सेना से रिटायर्ड गुरुमूर्ति ने पत्नी माधवी की हत्या कर दी। लाश के टुकड़े किए और प्रेशर कुकर में उबालकर झील में फेंक दिए।

इन मामलों में मर्डर करने वाले अपराधी या गैंगस्टर नहीं, बल्कि आम लोग हैं। कोई पड़ोसी, करीबी या रिश्तेदार। आखिर सामान्य लोग इतने बेरहम कैसे हो जाते हैं। साइकोलॉजिकल स्टडी और एक्सपर्ट के हवाले से समझिए पूरी कहानी।

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लाश के टुकड़े क्यों, फोरेंसिक एक्सपर्ट्स ने बताईं वजह कोई इंसान मर्डर के बाद लाश के साथ इतनी क्रूरता क्यों करता है, इसे समझने के लिए 2012 में एक स्टडी की गई थी। फिनलैंड की रिसर्चर्स हेलिना और एइला ने ‘जर्नल ऑफ फोरेंसिक साइंसेज’ के नाम से रिसर्च पेपर पब्लिश किया था। इसमें डेडबॉडी को काटने या टुकड़े करने के पीछे 5 मकसद बताए गए।

1. खुद को बचाने के लिए अपराधी का मकसद क्रूरता करना नहीं, बल्कि खुद को बचाना होता है। वह लाश को काटता है, ताकि उसे सूटकेस या बैग में छिपाकर आसानी से ठिकाने लगा सके। हालिया मामलों में यही वजह सबसे ज्यादा सामने आई है।

2. गुस्से या नफरत की वजह से मर्डर करने वाले के मन में मरने वाले के लिए बहुत ज्यादा नफरत हो। वह हत्या के बाद गुस्सा शांत करने के लिए डेडबॉडी को नुकसान पहुंचाता है।

3. सेक्शुअल डेविएशन या यौन विकृति यह गंभीर मानसिक बीमारी है। इसमें अपराधी फैंटेसी के लिए शरीर के अंगों को काटता है।

4. मानसिक विक्षिप्तता हत्यारा पूरी तरह मानसिक संतुलन खो चुका हो और उसे एहसास ही न हो कि वह क्या कर रहा है।

5. किसी को मैसेज देना गिरोह या अंडरवर्ल्ड में किसी को खौफजदा करने या मैसेज देने के लिए लाश के साथ वीभत्स बर्ताव किया जाता है।

आम आदमी के हैवान बनने के 4 बड़े कारण नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB के मुताबिक 2025 में भारत में हत्या के 27,300 केस सामने आए। हालांकि कितने केस में शव के टुकड़े किए गए, रिकॉर्ड में इसकी जानकारी नहीं है।

हत्या के बाद बॉडी के टुकड़े करने के पीछे क्या वजह होती है, इस पर हमने AIIMS के पूर्व डायरेक्टर और फोरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. तीरथ दास डोगरा, साइकियाट्रिस्ट डॉ. नाहिद दवे, साइकॉलोजिस्ट हिमानी कुलकर्णी और सर गंगाराम अस्पताल में साइकियाट्रिस्ट डॉ. राजीव मेहता से बात की।

एक्सपर्ट्स की बातचीत से चार फैक्टर समझ आए।

1. दूसरों के दुख-दर्द से मतलब न रखना AIIMS के पूर्व डायरेक्टर तीरथ दास डोगरा ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर आरुषि हत्याकांड जैसे केस में पोस्टमॉर्टम किया है। वे निठारी केस में फोरेंसिक एक्सपर्ट के तौर पर जांच में जुड़े थे।

डॉ. डोगरा लोगों में संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों की कमी को ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं, ‘आबादी बढ़ने के साथ नैतिक मूल्य बदल रहे हैं। इससे लोगों में क्रूरता बढ़ी है। पहले घर, परिवार और स्कूलों में मूल्यों की शिक्षा दी जाती थी। इससे लोगों में सहानुभूति और सहनशीलता बनी रहती थी।’

डॉ. डोगरा आगे बताते हैं कि अब लोगों को सिखाया जाता है कि तुम अपनी चिंता करो, दूसरों की नहीं। इससे इंसान अलग-थलग पड़ जाता है। दूसरों का दर्द महसूस नहीं कर पाता। लोगों में अहंकार और स्वार्थ हावी हो जाता है। भारत में यही हो रहा है। लोग अब अपने बारे में ज्यादा सोचते हैं। कम ही लोगों को चिंता है कि उनकी वजह से दूसरों पर क्या असर होगा।

अपनी बात समझाने के लिए डॉ. डोगरा एक उदाहरण देते हैं। वे बताते हैं कि AIIMS में मॉर्च्युरी का बेसमेंट रेडियोलॉजी और इमरजेंसी डिपार्टमेंट के पास था। किसी की मौत होने पर डेडबॉडी के साथ 500 तक लोग आ जाते थे। पूरा गलियारा भर जाता था। अब ऐसा नहीं होता।

2. जल्दी आपा खो देना साइकियाट्रिस्ट डॉ. नाहिद दवे कहती हैं, ‘फ्रंटियर ऑफ साइकोलॉजी जर्नल में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि लोगों में इंपल्सिविटी बढ़ी है। वे जल्दी आपा खो देते हैं। दूर के नतीजों की बजाय हालिया फायदे-नुकसान के बारे में सोचकर काम करते हैं। इससे बर्दाश्त करने की क्षमता कम हो गई है। इससे कुछ भी करते वक्त अब बर्दाश्त नहीं करूंगा वाली मानसिकता हावी हो जाती है। कुछ लोगों को क्राइम करने पर पछतावा नहीं होता। इससे अपराध करना आसान हो जाता है।’

बिना क्रिमिनल हिस्ट्री वाले लोग भी मर्डर करने के बाद लाश के टुकड़े करने की हिम्मत कैसे जुटा लेते हैं? इसका जवाब साइकोलॉजिस्ट हिमानी कुलकर्णी देती हैं। हिमानी आठ साल से दिल्ली में युवाओं की मेंटल हेल्थ पर काम कर रही हैं।

वे कहती हैं, ‘लोग एक दिन में अपराधी नहीं बनते। छोटी-छोटी घटनाएं उन हालात तक पहुंचाती हैं। जघन्य अपराध के वक्त इंसान में भरा गुस्सा बाहर निकलता है। इसके पीछे परिवार की समस्याएं, नौकरी या दूसरी वजह हो सकती हैं।’

हिमानी मानती हैं कि ऐसे अपराध ‘इमोशनल ट्रिगर’ यानी किसी बात के चुभ जाने से होते हैं। अपराधी खुद को सही ठहराते हैं कि वे गलत नहीं हैं। अपराध करने वाले को वही आखिरी रास्ता लगने लगता है। ऐसे में अपराधी लाश के टुकड़े-टुकड़े तक कर देते हैं।

3. कहीं और का गुस्सा दूसरी जगह निकलना दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में साइकियाट्रिस्ट डॉ. राजीव मेहता कहते हैं कि बड़े स्तर पर देखा जाए तो ये समस्या निजी नहीं, बल्कि समाज से जुड़ी है। रेपिस्ट जेल से छूट रहे हैं। काम की कमी और करप्शन से लोगों के अंदर हताशा बढ़ी है। लोग देख रहे हैं कि ताकतवर लोग कुछ भी कर रहे हैं। यह समाज को अशांति की ओर ले जा रहा है। कहीं और का गुस्सा दूसरी जगह निकल जाता है।

गाजियाबाद केस का जिक्र कर डॉ. राजीव बताते हैं, ‘आरोपियों ने 5 महीने से किराया नहीं दिया था। फिर मकान मालकिन को काटकर सूटकेस में भर दिया। आरोपी पति-पत्नी का कहना है कि बीमारी की वजह से किराया नहीं दे रहे थे। किराया मांगने पर इतना बड़ा विवाद नहीं होता। इस केस में पैसे की तंगी का गुस्सा था, जो उस समय मकान मालकिन दीपशिखा पर निकला।’

4. इंटरनेट और फिल्मों की नकल हिमानी सोशल मीडिया पर क्राइम में मदद करने वाली जानकारी आसानी से मिलने पर चिंता जताती हैं। श्रद्धा वालकर केस में पता चला कि आरोपी आफताब ने वेब सीरीज से बॉडी के टुकड़े करने का आइडिया लिया था।

लोगों में संवेदनशीलता कम होने के पीछे डॉ. नाहिद सोशल मीडिया की लत को जिम्मेदार मानती हैं। वे कहती हैं कि सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाला लगभग हर शख्स डूम स्क्रॉलिंग करता है।

डॉ. नाहिद इसे समझाते हुए बताती हैं, ‘हम एक रील दुख के भाव की देखते हैं। 20 से 30 सेकेंड बाद फिर तुरंत खुशी या कोई दूसरे भाव की रील आ जाती है। इससे इंसान के दिमाग की आदत ज्यादा देर तक एक भावना पर टिकने वाली नहीं रह जाती। फिर हीनियस क्राइम करते हुए भी इंसान ज्यादा गिल्ट महसूस नहीं करता है।’

‘फिल्मों में जरूरत से ज्यादा हिंसा दिखाना खतरनाक’ डॉ. नाहिद कहती हैं कि हिंसा से भरे वीडियो गेम और फिल्में बहुत आम हैं। पहली बार खून या हिंसा देखने पर इंसान असहज होता है, लेकिन लगातार ये देखने से यह सामान्य लगने लगता है। दिमाग के मिरर न्यूरॉन्स आसपास चल रही चीजों की नकल करते हैं। ब्लड फोबिया यानी खून का डर भी धीरे-धीरे दूर हो जाता है।’

श्रद्धा वालकर केस के आरोपी आफताब पूनावाला ने पुलिस को दिए बयान में माना था कि वह क्राइम बेस्ड अमेरिकन सीरीज डेक्सटर देखता था। इस सीरीज में लाश के टुकड़े करने के सीन दिखाए गए हैं।

‘खबरों को सनसनी बनाकर दिखाने से उन्माद बढ़ रहा’ फोरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. डोगरा कहते हैं कि ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। अपने करियर के दौरान मैंने ऐसे कई मामले संभाले हैं। आरुषि केस, निठारी कांड, श्रद्धा वालकर या ऐसी ही हालिया घटनाओं को देखें तो रिपोर्टिंग करते हुए मीडिया भी असंवेदनशील हो जाता है। खबर को सनसनी बनाकर दिखाने से लोगों में उन्माद बढ़ता है।

लगातार मीडिया में आ रही सनसनीखेज खबरें संवेदनशीलता को धीरे-धीरे कम कर देती हैं। इससे अपराधी हिंसा को आम मानने लगता है। इस पर एक्सपर्ट लोरेन कोलमैन की स्टडी कहती है कि किसी अपराधी की नकल करके हत्या करना यानी कॉपी कैट मर्डर असल में होता है।

मीडिया ऐसी खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर बार-बार दिखाता है, तो यह बीमारी की तरह फैलता है और लोग इसे देखकर वैसे ही अपराध दोहराने लगते हैं। जरूरी है कि मीडिया अपराध की रिपोर्टिंग करते वक्त उसे सनसनी बनाने के बजाय चेतावनी के तौर पर पेश करे।

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