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मनोज जोशी का कॉलम: अमेरिका की पाक नीति से तालमेल बैठाना कठिन है

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मनोज जोशी का कॉलम:  अमेरिका की पाक नीति से तालमेल बैठाना कठिन है

मनोज जोशी का कॉलम: अमेरिका की पाक नीति से तालमेल बैठाना कठिन है

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  • Manoj Joshi’s Column: It’s Difficult To Reconcile America’s Pakistan Policy

15 घंटे पहले

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मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार

भारत-अमेरिका ट्रेड डील के आसार नजर नहीं आ रहे। अमेरिका में निर्यातित अधिकतर चीजों पर हमें 50% टैरिफ चुकाना पड़ रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का कहना है नवंबर तक समझौता हो सकता है। लेकिन ऐसा तो वे कई महीनों से कह रहे हैं। स्पष्ट नहीं है आगे क्या होगा?

हाल ही में भारत ने रूस, चीन और अन्य देशों के साथ मिलकर ट्रम्प के अफगानिस्तान के बगराम एयरबेस पर फिर से अमेरिकी सेनाओं की तैनाती के कदम का विरोध किया था। मॉस्को में हुई फॉर्मेट कंसल्टेशन की बैठक में अफगानिस्तान, भारत, ईरान, पाकिस्तान, चीन, रूस ने कहा कि वे किसी देश द्वारा अफगानिस्तान और पड़ोसी राज्यों में अपने सैन्य ढांचों की तैनाती के कदमों का विरोध करते हैं। बयान में बगराम या अमेरिका का नाम नहीं था, लेकिन साफ तौर पर संदेश ट्रम्प के लिए था।

इसी के साथ, अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को उन देशों की सूची में शामिल करने का फैसला भी सामने आया, जिन्हें अत्याधुनिक मिसाइल एआईएम-120डी का एक्सपोर्ट वर्जन मिलेगा। यह मिसाइल अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को पहले ही दिए जा चुके एफ-16 विमानों में इस्तेमाल होती है।

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कथित तौर पर 2019 में भारत के विंग कमांडर अभिनंदन का मिग-21 इसी मिसाइल से गिराया गया था। हालांकि, अमेरिकी दूतावास ने इस खबर से इनकार करते हुए कहा कि पाकिस्तान को महज उसके मौजूदा भंडार को बनाए रखने के लिए ही मिसाइलें दी जा रही हैं। एआईएम जैसी मिसाइलें लड़ाकू विमानों की दृश्य सीमा से परे के लक्ष्यों के लिए भी काम आती हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच हाल के युद्ध में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

ये घटनाक्रम ऐसे वक्त पर सामने आया है, जब ट्रम्प का झुकाव पाकिस्तान की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान से महत्वपूर्ण खनिजों की पहली खेप अमेरिका पहुंच चुकी है। याद करें कि पाकिस्तान में खनिज की प्रोसेसिंग सुविधाएं विकसित करने के लिए यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स (यूएसएसएम) और पाकिस्तान की सैन्य फर्म फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गेनाइजेशन के बीच 500 मिलियन डॉलर के निवेश समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। व्हाइट हाउस ने पिछले महीने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें मुनीर ट्रम्प को रेयर-अर्थ खनिजों का बॉक्स दिखा रहे थे। इनमें से अधिकतर खनिज बलूचिस्तान प्रांत में मिलते हैं, जहां पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह चल रहा है।

ट्रम्प से मुलाकात के पहले पाकिस्तानी और अमेरिकी अधिकारियों ने ग्वादर के पास पासनी में एक बंदरगाह स्थापित करने पर भी चर्चा की। जाहिर है कि ऐसा दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण खनिज सौदे को आगे बढ़ाने के लिए हुआ होगा। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर कोई पुष्टि या खंडन सामने नहीं आया है।

मछुआरों का यह गांव रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और यहां पाकिस्तान का एक नौसेना हवाई स्टेशन और सैन्य एयरपोर्ट है। पासनी की ग्वादर से महज 110 किमी और ईरान-पाक सीमा से 160 किमी दूरी होने के कारण यह डील भू-राजनीतिक दृष्टि से अहम है।

भारत के हितों के विरुद्ध उठाए एक और कदम के तहत अमेरिका ने ईरान पर लगाए प्रतिबंधों के तहत भारत को अतीत में दी गई चाबहार बंदरगाह के संचालन की छूट भी वापस ले ली है। अफगानिस्तान से वापसी के बाद अमेरिका नहीं चाहता कि भारत इसका इस्तेमाल जारी रखे। लेकिन तालिबान सरकार से सम्पर्क बढ़ने के बाद भारत के लिए यह बंदरगाह ईरान और मध्य एशिया के साथ व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।

बंदरगाह विकसित करने का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की अड़चन को दरकिनार करना था, जो भारत द्वारा जमीन के जरिए पश्चिम एशिया में किए जाने वाले व्यापार के बीच आ रहा था। भारत के पास रणनीतिक तौर पर इस प्रकार की अमेरिकी नीति से तालमेल बैठाने की ज्यादा गुंजाइश अब बची नहीं है।

कई लोग सोचते हैं कि भारत को संयम बनाए रखना चाहिए। लेकिन ट्रम्प पाकिस्तान के साथ लगातार रिश्ते बढ़ा रहे हैं। ऐसे में भारत के पास रणनीतिक तौर पर इस अमेरिकी नीति से तालमेल बैठाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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