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ब्लैकबोर्ड-विकलांग हूं, मसाज-थेरेपी के बहाने डॉक्टर ने सारे कपड़े उतारे: मैं क्लिनिक से निकलकर भागी, स्कूटी जाम में फंसी तो शख्स बोला- चल नहीं पाती तो घर रहा करो

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ब्लैकबोर्ड-विकलांग हूं, मसाज-थेरेपी के बहाने डॉक्टर ने सारे कपड़े उतारे:  मैं क्लिनिक से निकलकर भागी, स्कूटी जाम में फंसी तो शख्स बोला- चल नहीं पाती तो घर रहा करो

ब्लैकबोर्ड-विकलांग हूं, मसाज-थेरेपी के बहाने डॉक्टर ने सारे कपड़े उतारे: मैं क्लिनिक से निकलकर भागी, स्कूटी जाम में फंसी तो शख्स बोला- चल नहीं पाती तो घर रहा करो

‘मेरे पैर का ऑपरेशन हुआ था। पट्टियां हटने के बाद उसमें हल्का-हल्का दर्द हो रहा था। मैं डॉक्टर के पास गई थी। उस डॉक्टर ने मुझे कमरे में बुलाया और कहा, ‘मैं आपकी मसाज थेरेपी करूंगा। उसने मुझे स्ट्रेचर पर लिटाया। कमरे की लाइट धुंधली कर दी और उसने मेरे स

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ब्लैकबोर्ड में इस बार कहानी उन विकलांग लड़कियों की, जिनकी शारीरिक हालत का फायदा उठाने की कोशिश गई। आंख से न देख पाने वाली लड़कियों को मदद के बहाने गलत तरीके से छुआ गया।

राखी पांडे पिछले 15 साल से दिल्ली में बुटीक चलाती हैं। वह सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं और व्हीलचेयर मॉडलिंग भी करती हैं और मैराथन में भी हिस्सा लेती हैं। शारीरिक चुनौती के कारण वह केवल 10वीं तक पढ़ पाईं। उन्हें लोकोमोटर डिसेबिलिटी है, यानी चलने-फिरने में दिक्कत होती है। वह जब छह महीने की थीं, तभी उन्हें पोलियो हो गया था।

राखी बताती हैं कि जब मैं छोटी थी तो विकलांग होने के कारण मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे अलग-थलग कर दिया। वो अपने बच्चों को मुझसे दूर रखते थे। उन्हें डर था कि पोलियो उनके बच्चों में भी न फैल जाए।

वह बताती हैं कि जब 12 साल की हुई तो उनके पैर का दिल्ली के पीतमपुरा के एक अस्पताल में ऑपरेशन हुआ। उस वक्त गलत छूने की समझ ज्यादा नहीं थी। वह बताती हैं, ‘इलाज के बहाने अस्पताल का एक नर्सिंग स्टाफ जानबूझकर मेरी जांघ पर हाथ रखता। बॉडी मसाज करते वक्त छाती पर हाथ लगा रहा था। मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और मम्मी-पापा को बुलाकर बताया। उसके बाद अस्पताल के मैनेजर से शिकायत की गई। बाद में अस्पताल की महिला डॉक्टर आईं और मेरी पट्टी बदली।

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राखी कहती हैं कि स्कूल की पढ़ाई के बाद मैं घर पर रहने लगी थी। पापा को उस समय हाई शुगर का पता चला। वो कई साल तक बेड पर रहे। मेरी दो बहनों की शादी हो गई थी। मैं पापा के साथ घर पर अकेली रह गई थी। मुझे ऐसा लगने लगा था जैसे कि पापा के ऊपर बोझ हूं। बहुत तनाव होने लगा। मुझे मानसिक झटके आने लगे। डिप्रेशन में चली गई। दो साल तक तनाव से जूझती रही।

मेरी बहनें डॉक्टर के पास ले गईं। डॉक्टर ने सलाह दी कि इनको किसी काम में लगाइए, ताकि ये व्यस्त रह सकें और कमाई कर सकें। इससे वह खुद अपने पैरों पर खड़ी हो पाएंगी और तनाव नहीं होगा।

उसके बाद मेरी बहनों ने पैसे जुटाकर बुटीक खुलवाया। अब यह काफी अच्छी चल रही है।

वह बताती हैं कि इस दौरान एक लड़का मेरे पीछे पड़ गया। वो मुझे दिन में कई बार कॉल करता, गंदे मैसेज भेजने लगा। अश्लील वीडियो भेजता। उसने मुझे इतना परेशान कर दिया कि लगा कि आत्महत्या कर लूं। तंग आकर मैंने मम्मी और बहनों को बताया। उस लड़के के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई, तब जाकर उसने पीछा छोड़ा। उसकी नजर मेरे शरीर और पैसों पर थी।

वह एक शादी में जाने का किस्सा बताती हैं। वह कहती हैं कि मैं एक बार एक रिश्तेदार की शादी में गई। वहां मैं व्हीलचेयर से पहुंची तो लोग मुझे घूरने लगे। वहां मौजूद एक महिला इतनी नाराज हो गईं कि कहने लगीं- ‘इनका शादी में आना जरूरी था क्या? अगर वह नहीं आती तो क्या शादी नहीं होती? उस दिन मुझे इतना बुरा लगा कि फिर कभी किसी शादी में नहीं गई।

राखी एक बार सड़क पर हुई बदतमीजी का किस्सा बताते हुए कहती हैं- मैं घर से स्कूटी लेकर निकली। रास्ते में लंबा जाम लगा था। काफी देर वहां फंसी रही। पीछे खड़े एक आदमी ने गुस्से में कहा- ‘जब तुम चल नहीं सकती, तो घर पर क्यों नहीं रहती? बाहर निकलना जरूरी है क्या?’

उसकी बात पर मुझे बहुत गुस्सा आया। मेरी उससे बहस हो गई। मैं सोचने लगी कि क्या हम जैसे विकलांग लोगों को सड़क पर चलने का अधिकार नहीं है? लोग बिना सोचे-समझे कुछ भी कह देते हैं।

राखी हाल में अपने साथ घटी एक घटना के बारे में बताते हुए कहती हैं। बुटीक के दुकान से जुड़े एक काम के सिलसिले में व्हीलचेयर से जा रही थी। व्हीलचेयर का पिछला पहिया अचानक निकल गया। वहां मौजूद एक शख्स आए और उसे ठीक करने लगे। वह ठीक करते हुए मुझसे मेरा फोन नंबर और फेसबुक आईडी मांगने लगे। मैंने देने से मना कर दिया।

फिर पूछने लगे कि शादी हुई है? जब मैंने कहा- नहीं, तो वह बोले- ‘मुझसे शादी करोगी?’ गुस्से में उनका सवाल टाल गई। फिर कहने लगे फेसबुक आईडी न हो तो इंस्टाग्राम की ही आईडी दे दो। मैंने कहा कि ऐसा कीजिए, आप रहने दीजिए, मैं अपनी व्हीलचेयर खुद ठीक कर लूंगी। जब वह जाने लगे तो बोले मेरा नंबर ले लो। कोई भी परेशानी हो, तो तुरंत फोन कर सकती हो, मैं तुरंत पहुंचूंगा।

राखी कहती हैं आखिर मैंने उन्हें मदद के लिए नहीं बुलाया था। वे खुद आए थे और मुझसे पर्सनल होने लगे थे। उनकी बात से साफ लग रहा था कि वह मदद से ज्यादा मुझमें रुचि दिखा रहे थे।

कोरोना महामारी के वक्त मेरे साथ एक घटना घटी। मैं एक एनजीओ से जुड़ी थी। उस समय मैं एनजीओ के लिए मास्क बेचती थी। मेरे साथ एक लड़का काम करता था। उसने भरोसे में लेकर सारा पैसा अपने अकाउंट में जमा करवा लिया। जब मैंने उससे अपना पैसा मांगा तो उसने कहा कि मुझसे शादी करोगी, तभी पैसा दूंगा। मजबूरी में मैंने पैसा मांगना बंद कर दिया।

उसी महामारी में पापा की मौत हो गई थी। उस समय एनजीओ से जुड़े कई लोग तेरहवीं में आए थे। मेरी दीदी ने उनसे थोड़ी मदद करने को कहा तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। दरअसल, ये एनजीओ के लोग विकलांग लोगों के नाम पर सरकार से बहुत फंड लेते हैं, लेकिन मदद के नाम पर बस दिखावा करते हैं। सारा फंड हड़प जाते हैं।

राखी पांडे कहती हैं- मैं घर से स्कूटी लेकर निकली। रास्ते में लंबा जाम लगा था। काफी देर वहां फंसी रही। पीछे खड़े एक आदमी ने गुस्से में कहा- ‘जब तुम चल नहीं सकती, तो घर पर क्यों नहीं रहती? बाहर निकलना जरूरी है क्या?’

ब्लाइंड साम्या मॉडलिंग में विजेता बनीं तो शख्स ने घसीटा

इसी तरह साम्या खान ब्लाइंड यानी दृष्टिबाधित हैं। वो ब्लाइंड कैटेगरी में पिछले तीन साल से मॉडलिंग कर रही हैं। कहती हैं कि मेरा सपना मॉडल बनना और एक्टिंग करना है। वह बताती हैं कि 9वीं क्लास तक बिल्कुल ठीक थी। उसके बाद धीरे-धीरे मुझे दिखाई देना कम होने लगा। एक समय तो ऐसा आया कि दिखना एकदम से बंद हो गया। फिर पढ़ाई छूट गई और मैं घर पर रहने लगी।

घर पर रहने के दौरान सरकार की तरफ से मुझे डिसेबिलिटी कार्ड (विकलांगता कार्ड) मिला। कार्ड दिखाते हुए साम्या कहती हैं कि इसका कोई फायदा नहीं मिलता। इसके जरिए कई जगह इलाज कराने गई, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला। कई जगह मुफ्त इलाज तक नहीं हुआ। शुरुआत मैं अपनी आंखों से सामान्य तौर से देख पाती थी, लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ। इतना कहते ही साम्या फफककर रोने लगती हैं।

आंसू पोछते हुए वो कहती हैं, ‘मैं चाहती हूं कि लोग मुझे आम लड़कियों की तरह समझें, न कि विकलांग।’ दरअसल, कहीं भी लाइन में खड़ी होती हूं तो लोग धक्का मार देते हैं। कई बार गिर पड़ती हूं।

भले ही मुझे नहीं दिखता, लेकिन अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं। मॉडलिंग में करियर बनाने की कोशिश कर रही हूं। अब तक मैंने कई शो किए हैं। मेरी बहन भी मॉडल है, वही मुझे इसमें करियर बनाने में मदद कर रही है।

साम्या कहती हैं कि मेरी एक चाची मेरे घर आई थीं। वो मुझे देखकर कहने लगीं, ‘इसकी आंखें हिलती रहती हैं। इसकी शादी कैसे होगी भला? अगर शादी के लिए कोई लड़का मिला भी तो इन्हीं की तरह मिलेगा।’ मम्मी से कहने लगीं- इसे मॉडलिंग के लिए क्यों भेजती हो? घर बिठाओ। उनकी बातें इतनी खराब लगीं कि मैं उठकर अपने कमरे में चली गई और रोने लगी। हालांकि मेरे पेरेंट्स मेरा सपोर्ट करते हैं। वो कहते हैं कि मेरी बेटी जरूर कुछ अच्छा करेगी।

हाल ही में एक फिल्म रिलीज हुई। मेरी मॉडलिंग करने वाली बहन को उसमें जाने का बुलावा आया। मैं भी उसके साथ जाना चाहती थी, लेकिन आयोजकों ने साफ मना कर दिया। कहा- उन्हें मत लाइए, हम संभाल नहीं पाएंगे। उस दिन बहुत अपसेट हो गई थी।

साम्या बताती हैं कि उसके बाद एक मॉडलिंग शो का आयोजन हुआ। वहां मैं विजेता बनी थी। एक लड़का मेरे विजेता बनने से दुखी था। जब अवॉर्ड दिया जा रहा था तो वो मुझे मंच पर घसीटकर ले गया। मैंने गाउन पहन रखा था। गिरते-गिरते बची थी। उस दिन उसकी हरकत से बहुत दुख हुआ था।

साम्या ब्लाइंड हैं। वह बताती हैं कि एक मॉडलिंग शो में वह विजेता बनी थीं। एक लड़का उनके विजेता बनने से दुखी था। जब अवॉर्ड दिया जा रहा था तो उसने मुझे मंच पर घसीटा।

साम्या की मां शहजादी कहती हैं कि मेरी बच्ची को अचानक से दिखना बंद हो गया। उसके लिए यह सदमे जैसा था, उसकी सहेलियां छूट गईं, वो अकेली हो गई है। अब उसे घर में रहना पड़ता है। जब उसे कभी शादियों में लेकर जाती हूं तो लोग टोकते हैं। कहते हैं कि ‘इसे क्यों लेकर आ गई।’ इसी के जैसे किसी लड़के को ढूंढ़कर इसकी शादी कर दीजिए।’

वह कहती हैं कि बेशक, मेरी बच्ची पूरी तरह से ब्लाइंड है, उसे सपोर्ट चाहिए। दया नहीं, अवसर चाहिए। चाहती हूं कि मॉडलिंग से वह ऐसी बन जाए कि उसे किसी की मदद की जरूरत न पड़े। जब से यह मॉडलिंग के लिए जाने लगी है तब से मेरे कुछ रिश्तेदारों ने तो हमसे दूरी बना ली है। वे कहते हैं, ‘उसे मॉडलिंग के लिए क्यों भेजती हो। उसे घर पर ही रखा करो।’

एक बार साम्या को उल्टियां हो रही थीं। अस्पताल लेकर गई तो डॉक्टरों ने इलाज करने से इनकार कर दिया, कहा- हम ब्लाइंड लड़कियों का इलाज नहीं करते। केवल रेफर कर सकते हैं।

साम्या की मां शहजादी बताती हैं कि एक बार साम्या को उल्टियां हो रही थीं। अस्पताल लेकर गई तो डॉक्टरों ने इलाज से इनकार कर दिया, कहा- हम ब्लाइंड लड़कियों का इलाज नहीं करते।

पैर से विकलांग ललिता को टीचर ने गलत तरीके से छुआ

39 साल की ललिता दिल्ली में रहती हैं। वह डेढ़ साल की थीं, तभी उनके पैर में पोलियो हो गया। वो इस समय विकलांग बच्चों को पढ़ाती हैं। ललिता कहती हैं कि मेरे पैर काम नहीं करते थे। मां ने इलाज करवाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसी समय मेरे पापा की मौत हो गई। सारी जिम्मेदारी मम्मी के कंधों पर आ गई। मेरी दो छोटी बहनें भी थीं। मैं सबसे बड़ी थी।

नम आंखों से ललिता कहती हैं कि मम्मी बहुत परेशान थीं। मेरे मामा मुझे इलाज के लिए एक अस्पताल लेकर गए। वहां लगभग छह साल तक इलाज चला। सहारा लेकर खड़ी होने लगी। इस तरह कुछ ठीक होने पर मम्मी ने मेरा स्कूल में एडमिशन करवा दिया। स्कूल जाने लगी तो वहां बच्चे मेरा मजाक उड़ाते थे। वे मुझे ‘लंगड़ी’ कहते थे। ये कहते हुए ललिता की आंखें भर आती हैं। तब मम्मी से कहती कि मुझे स्कूल नहीं जाना, लेकिन वह नहीं मानीं, जिद करके मुझे पढ़ाया। मेरे टीचर्स भी मेरा हौसला बढ़ाते थे।

जब मैं आठवीं क्लास में पहुंची तो मेरे दो छोटे ऑपरेशन हुए। उससे थोड़ा और सुधार हुआ, लेकिन तब भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई। स्कूल में पढ़ाई के बाद मैंने आईटीआई में एडमिशन लिया। उस वक्त एक टीचर ने मुझे कॉपी चेक करने के दौरान गलत तरीके से छुआ। जब वो बात अपने साथ की लड़कियों को बताया तो उन्होंने भी कहा कि उन्हें भी वे गलत तरीके से छूते हैं। वे टीचर, जब हमारी कॉपियां चेक करते थे तो पास बुलाकर हमारे ब्रेस्ट को छूते थे। तंग आकर हमने मैनेजर से शिकायत की। उसके बाद उन्हें वहां से निकाल दिया गया था।

आईटीआई के बाद मैंने एक कॉलेज में एडमिशन लिया। वहां भी लड़कों का नजरिया वैसा ही रहा। सोचिए बड़े लड़के भी राह चलते तंज कसते- ‘लंगड़ी’ कहकर चिढ़ाते, ‘ढाई टांगों वाली’ जैसे तंज कसते।

एक बार मेरी मौसी का बेटा मुझे एक जगह घुमाने ले गया। उसके साथ उसके दोस्त भी थे। मेरे साथ मेरी छोटी बहन भी जाना चाहती थी, लेकिन मम्मी ने उसे जाने से मना कर दिया। बाद में पता चला कि मम्मी ने उसे इसलिए मना किया क्योंकि लड़के उसके साथ कुछ गलत कर सकते थे क्योंकि मेरा पैर खराब था, तो मेरे साथ कुछ भी गलत न होता। उस दिन मम्मी की वह सोच बहुत चुभी थी।

बड़ी हुई तो मेरी शादी की बात चली। मैं शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन मेरे जैसे विकलांग लड़के का रिश्ता आया तो मम्मी ने मेरी शादी कर दी। हालांकि मेरे पति बहुत अच्छे हैं। वह मेरा बहुत ख्याल रखते हैं।

इस बीच, रिश्तेदारों के यहां आना-जाना बंद कर दिया है। दरअसल, मेरे एक बहुत करीबी रिश्तेदार के लड़के की शादी तय हुई। उन्होंने मुझे इंगेजमेंट में नहीं बुलाया क्योंकि कहीं उनके बेटे का रिश्ता न टूट जाए। वे मुझे अशुभ मान रहे थे।

जब मुझे यह बात पता चली तो बहुत दुख हुआ। उनके व्यवहार से इतना परेशान हुई कि डिप्रेशन में चली गई। डिप्रेशन के दौरान लकवे का दौरा आया था। नौ महीने अस्पताल में रही थी। उस वक्त मेरे पति ने मेरी खूब देखभाल की और मैं ठीक हो गई। इतना कहते हुए ललिता फफककर रोने लगीं।

दिल्ली की रहने वाली 39 साल की ललिता बताती हैं कि जब वह आईटीआई कर रही थीं तो उनके टीचर ने कॉपी चेक करते हुए उनको गलत तरीके से छुआ था। स्कूल में बच्चे इन्हें ‘लंगड़ी’ और ढाई टांगों वाली कहते थे।

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1- ब्लैकबोर्ड-पत्नी को लोग कोठेवाली समझते हैं:जीबी रोड का पता देख बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता; दोस्त कहते हैं चलो तुम्हारे घर मौज करते हैं

हलचल भरी दिल्ली में शाम ढलने लगी थी। मैं शहर के जीबी रोड पहुंची। इसे रेड लाइट एरिया भी कहा जाता है। यह इलाका सेक्स वर्क के लिए बदनाम है। दूर से ही सेक्स वर्कर्स के कोठे नजर आ रहे थे, जिनकी खिड़कियों से सजी-संवरी महिलाएं झांक रही थीं। एक-एक करके ग्राहक बाहर बनी सीढ़ियों से उन कोठों पर जा रहे थे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

2- ब्लैकबोर्ड- तंग आकर घाघरा-चोली आग में फेंक दी:लोग लड़की समझकर पीछा करने लगते थे; तब बताना पड़ता कि ‘भाई, मैं मर्द हूं’

‘मेरे भीतर एक औरत थी। शुरुआत से ही। दुनिया क्या कहेगी, लोग क्या कहेंगे, यह सब सोचकर मैं चुप रह जाती थी। फिर एक दिन मैंने तय कर लिया कि अपने भीतर की औरत को सजाना है, संवारना है और दुनिया के सामने निखारना है। मैंने महिलाओं से घाघरा-चोली मांगे और फेयर एंड लवली लगाकर सज गई। मुझे बॉलीवुड की नूरजहां बहुत पसंद थीं, सो मैंने अपना नाम नूरजोरा रख लिया। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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