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इंजीनियर बनने का सपना टूटा,किन्नू से 21 लाख की कमाई: हिमालय के पानी ने बढ़ाया फ्रूट का टेस्ट, विदेशों में डिमांड, सबसे महंगी वाइन में इस्तेमाल – Sriganganagar News

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इंजीनियर बनने का सपना टूटा,किन्नू से 21 लाख की कमाई:  हिमालय के पानी ने बढ़ाया फ्रूट का टेस्ट, विदेशों में डिमांड, सबसे महंगी वाइन में इस्तेमाल – Sriganganagar News

इंजीनियर बनने का सपना टूटा,किन्नू से 21 लाख की कमाई: हिमालय के पानी ने बढ़ाया फ्रूट का टेस्ट, विदेशों में डिमांड, सबसे महंगी वाइन में इस्तेमाल – Sriganganagar News

इंजीनियर बनने का सपना अधूरा छूटा तो आर्ट्स से ग्रेजुएशन करना शुरू किया, लेकिन फिर पिता का निधन हो गया। पारिवारिक और खेती को संभालने की जिम्मेदारी में पढ़ाई ही छूट गई।

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फिर 25 साल तक पारंपरिक खेती में कई प्रयोग कर उससे हर साल ठीक-ठाक मुनाफ कमाने का प्रयास करता रहा। इसके बाद साल 2005 में खेती में एक और रिस्क लिया और किन्नू की बागवानी करने की ठानी।

इस एक फैसले ने 50 साल किसान की किस्मत बदल दी। आज 20 साल बाद वो किन्नू से सालाना 21 लाख तक की कमाई कर रहा है। उनके किन्नू की सप्लाई विदेशों तक है। वाइन जैसे कई प्रोडक्ट भी इसी गंगानगरी किन्नू से बन रहे हैं।

म्हारे देस की खेती में आज बात श्रीगंगानगर के किसान दिलीप सिंह (70) की …

किसान दिलीप सिंह इंजीनियर बनाना चाहते थे। किस्मत ने साथ नहीं दिया और पढ़ाई बीच में छूट गई।

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इंजीनियर बनने का सपना टूटा

किसान दिलीप सिंह बताते हैं- उनका सपना इंजीनियर बनने का था। साल 1979 में एंट्रेंस टेस्ट दिया, लेकिन क्वालीफाई नहीं कर सके। इसके बाद ग्रेजुएशन के लिए कॉलेज में एडमिशन ले लिया।

वर्ष 1980 में जब वे सेकंड ईयर में थे, तभी पिता रामचंद्र गोदारा का निधन हो गया। बड़े भाई देवीलाल पहले से ही खेती करते थे। पिता के जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं और पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

किन्नू के पौधे से 35 साल तक फ्रूटिंग होती है। इसलिए ये किसानों के लिए काफी फायदेमंद है।

25 साल तक पारंपरिक खेती के बाद की बागवानी

करीब 25 वर्षों तक उन्होंने पारंपरिक खेती की। गेहूं, कपास (कॉटन), सरसों और अन्य फसलें उगाईं, लेकिन मुनाफा कम और मेहनत ज्यादा लगती थी।

ऐसे में वर्ष 2005 में उन्होंने बागवानी की ओर कदम बढ़ाने का फैसला किया। श्रीगंगानगर कृषि अनुसंधान केंद्र से किन्नू के 1000 पौधे खरीदे और 20×10 फीट की दूरी पर 8 बीघा जमीन में लगाए।

पौधों के बड़े होने तक खाली जगह का उपयोग करते हुए तीन साल तक सरसों, गेहूं व अन्य फसलें भी लगाईं। हालांकि इसका असर किन्नू के पौधों की ग्रोथ पर पड़ा।

इसके बाद एक साल खेत खाली छोड़ दिया ताकि पौधों की बढ़वार बेहतर हो सके। चौथे साल यानी 2009 में पहली बार बाग में फ्रूटिंग हुई।

प्रति बीघा करीब 50 क्विंटल उत्पादन मिला। उस समय बाजार भाव कम थे, इसलिए मुनाफा उम्मीद से कम रहा, लेकिन पहली ही बार में करीब 11 लाख रुपए की कमाई हुई।

एक बीघा में एवरेज 100 क्विंटल किन्नू की पैदावार होती है।

उत्पादन घटा, लेकिन भाव अच्छा मिला

दिलीप गोदारा ने बताया- 20 जुलाई को खेत में पौधे लगाए थे। सामान्य परिस्थितियों में एक बीघा से करीब 100 क्विंटल किन्नू का उत्पादन होता है।

2023 में 257 क्विंटल प्रति बीघा तक किन्नू की पैदावार हुई थी। उस वर्ष उत्पादन अधिक होने के कारण किन्नू का भाव केवल 10.25 रुपए प्रति किलो मिला।

पिछले दो वर्षों से उत्पादन घटकर करीब 100 क्विंटल प्रति बीघा रह गया है, लेकिन बाजार में भाव बेहतर मिलने लगे हैं। इस वर्ष किन्नू 27 रुपए प्रति किलो के भाव से बिका।

गंगनहर के पानी से आती है खास मिठास

कैलिफोर्निया (USA) से आई किन्नू की किस्म ने श्रीगंगानगर को नई पहचान दिलाई है। हिमालयन रेंज से निकलने वाली सतलुज नदी का पानी गंगनहर के जरिए यहां के किसानों तक पहुंचता है, जिससे जमीन की उर्वरता बनी हुई है।

इसी उपजाऊ मिट्टी और मीठे पानी की बदौलत यहां की किन्नू में खास मिठास आती है। यही कारण है कि किन्नू न केवल क्षेत्र की पहचान बनी, बल्कि किसानों की किस्मत भी लगातार बदल रही है।

श्रीगंगानगर के किन्नू की अलग मिठास के कारण डिमांड बनी रहती है। व्यापारी बागान में पहुंचकर अपने स्तर पर तुड़ाई करवाकर ट्रांसपोर्ट कर ले जाते हैं।

इंडिया सहित विदेशों में डिमांड

श्रीगंगानगर और पड़ोसी पंजाब के अबोहर की मंडियों में नवंबर से जनवरी तक अच्छी आवक होती है। रीको क्षेत्र में 24 से अधिक वैक्सिंग और ग्रेडिंग प्लांट लगे हैं, जहां से प्रोसेस्ड किन्नू बाहर सप्लाई होता है। श्रीगंगानगर का किन्नू बांग्लादेश, नेपाल, मॉरीशस के अलावा मुंबई, कोटा और जयपुर सहित देश-विदेश के कई बाजारों में भेजा जाता है।

गोवा में होती है महंगी वाइन तैयार

प्रोसेसिंग प्लांटों से किन्नू की पल्प (गूदा) बनाकर गोवा भेजा रहा है, जहां से महंगी वाइन तैयार होती है। किसानों का कहना है कि यहां भी वाइन फैक्ट्री लगाई जा सकती है, जिससे स्थानीय स्तर पर वैल्यू एडिशन और रोजगार बढ़ेगा।

हालांकि, श्यामा प्रसाद मुखर्जी योजना के तहत श्रीगंगानर में किन्नू प्रोसेसिंग प्लांट को मंजूरी मिली है। उद्यान विभाग की देखरेख में प्लांट लगाया जाएगा।

इसके लिए 5 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं। वहीं राज्य सरकार के बजट में श्रीगंगानगर को किन्नू के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस खुलेगा। शोध और प्रशिक्षण से किसानों को फायदा मिलेगा।

ग्राफ्टेड पौधों से मिलता है अच्छा उत्पादन

दिलीप गोदारा ने बताया- बीज से लगाए गए पौधों में उत्पादन कम होता है और फल देरी से आता है। ग्राफ्टेड पौधे रोपण के 3-4 साल में अच्छी मात्रा में फल देना शुरू कर देते हैं, जबकि बीज से उगाए गए पौधों में 5-7 साल तक का समय लग सकता है, इसलिए बीज से पौधे कम लगाए जाते हैं।

एक साल में तैयार होता है तीन फीट का पौधा

दिलीप गोदारा ने बताया कि नर्सरी में किन्नू का पौधा करीब एक साल में तीन फीट तक तैयार हो जाता है। सामान्य पौधों की कीमत 45 से 100 रुपए प्रति पौधा होती है।

अच्छी क्वालिटी के ग्राफ्टेड पौधे (2–3 फीट ऊंचे) 60 से 150 रुपए में मिल जाते हैं, जबकि हाइब्रिड पौधों की कीमत 300 से 700 रुपए तक होती है। श्रीगंगानगर, अबोहर (पंजाब) और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में ये पौधे अपेक्षाकृत सस्ते मिल जाते हैं।

पेड़ से 35 साल तक मिलते हैं फल

दिलीप गोदारा के अनुसार किन्नू के पौधे की औसत उम्र करीब 35 साल होती है। अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी का pH 6 से 7.5 होना जरूरी है

प्रत्येक पौधे के लिए करीब 50 किलो गोबर की खाद उपयोग में ली जाती है। खाद को पौधे के चारों ओर 4 फीट के दायरे में मिट्टी में मिक्स किया जाता है।

कभी-कभी पत्ते मुड़ने और नए फुटाव नहीं आने की समस्या आती है, लेकिन समय पर उपचार से पौधे स्वस्थ रहते हैं। प्रत्येक पौधे को 7 दिन में एक बार करीब 40 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

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