Advertising
Home Top stories अमेरिका की सबसे सफल स्कीयर जेसी डिगिंस की इंस्पायरिंग स्टोरी: फूड...
Advertising
<

अमेरिका की सबसे सफल स्कीयर जेसी डिगिंस की इंस्पायरिंग स्टोरी: फूड पॉइजनिंग से निढाल थी, शरीर टूट रहा था, रेस में गिरी भी, पर मां की सीख ने जिता दी हारी हुई बाजी

0
अमेरिका की सबसे सफल स्कीयर जेसी डिगिंस की इंस्पायरिंग स्टोरी:  फूड पॉइजनिंग से निढाल थी, शरीर टूट रहा था, रेस में गिरी भी, पर मां की सीख ने जिता दी हारी हुई बाजी

अमेरिका की सबसे सफल स्कीयर जेसी डिगिंस की इंस्पायरिंग स्टोरी: फूड पॉइजनिंग से निढाल थी, शरीर टूट रहा था, रेस में गिरी भी, पर मां की सीख ने जिता दी हारी हुई बाजी

  • Hindi News
  • Sports
  • The Inspirational Story Of Jessie Diggins, America’s Most Successful Skier, Jessie Diggins

द न्यू यॉर्क टाइम्स. वॉशिंगटन3 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

जेसी डिगिंस 2026 में इटली में होने जा रहे विंटर ओलिंपिक में पूरे दमखम के साथ हिस्सा लेंगीं।

बीजिंग विंटर ओलिंपिक का आखिरी दिन… प्रकृति और शरीर, दोनों मेरे खिलाफ थे। माइनस 21 डिग्री पारा और बर्फीले तूफान के बीच 30 किमी की रेस थी। रेस से 30 घंटे पहले फूड पॉइजनिंग से निढाल थी, न खाना पच रहा था, न ही जॉगिंग कर पा रही थीं। फिर भी मैं मैदान में उतरी…।’ अमेरिका की सबसे सफल क्रॉस-कंट्री स्कीयर जेसी डिगिंस कहती हैं- रेस के दौरान गिरने और शरीर में ऐंठन के बावजूद वे डटी रहीं। अंतत: रेस पूरी कर सिल्वर मेडल जीता और इतिहास रच दिया। तीन वर्ल्ड कप, तीन ओलिंपिक मेडल और सात वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीत चुकी डिगिंस 2026 में इटली में होने जा रहे विंटर ओलिंपिक में पूरे दमखम के साथ उतर रही हैं, जानिए उनके शीर्ष तक पहुंचने का सफर…

‘बात 2022 विंटर ओलिंपिक की है। रेस से पहले हुई फूड पॉइजनिंग से शरीर में पानी और ऊर्जा की भारी कमी हो गई। सुबह 10 मिनट की हल्की दौड़ भी पूरी नहीं कर पाई। बिस्तर पर गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी। मम्मी-पापा को फोन किया और बस इतना कह सकी,‘सब कुछ वैसा नहीं हो रहा, जैसा होना चाहिए था।’ शाम को शरीर थोड़ा संभला। स्पिन बाइक पर हल्की एक्सरसाइज की।

अगली सुबह बस में बैठी तो मां का ई-मेल देखा, जिसने मेरी बेचैनी शांत कर दी। उन्होंने लिखा, ‘तुम्हें यह रेस किसी के लिए नहीं करनी है। तुम पर किसी का उधार नहीं है। आज तुम स्कीइंग करती हो तो सिर्फ इसलिए करना क्योंकि तुम्हें इस खेल से प्यार है।’ बस, उसी पल दिमाग से दबाव और मन से बोझ हट गया। बर्फीली हवाएं बदन को चाकू की तरह चीर रही थीं। पर असली चुनौती बाहर का मौसम नहीं, बल्कि अंदर चल रहा तूफान था।

Advertising

जेसी कहती हैं- शरीर टूट चुका था, पर दिल हार मानने को तैयार नहीं था। आधा किलोमीटर के भीतर दूसरी स्कीयर ने कट दिया, मैं गिर पड़ी। आगाज बुरा था, पर मैं उठी। खुद से कहा,‘अब खोने को कुछ नहीं, बस दौड़ो।’ पर जैसे ही पहाड़ों पर चढ़ाई शुरू हुई, हिम्मत टूटने लगी…। फीड जोन में ड्रिंक लेते समय छोटी सी चूक हुई और नॉर्वे की योहॉग काफी आगे निकल गईं। तेज हवा में अकेले स्की करना खतरनाक था। कोच चिल्लाते रहे- अकेली मत रहो! पर मेरे पास कोई विकल्प था ही नहीं। मेरे घुटनों से शुरू हुई ऐंठन शरीर में फैल गई।

आखिरी लैप तक सबकुछ धुंधलाने लगा और आवाजें सुनाई देना बंद हो गईं। शायद पानी की कमी और गिरता शुगर लेवल मेरा रास्ता रोक रहे थे। 1 घंटा 26 मिनट और 37 सेकेंड में फिनिश लाइन पार की, तो मैं बर्फ पर ऐसे गिरी जैसे किसी ने कठपुतली के धागे काट दिए हों। आंखों के लेंस पुतलियों पर जम चुके थे। मैं बस बुरी तरह हांफ रही थी। उस वक्त मुझे अस्पताल जाना चाहिए था, पर मैं पोडियम तक गई और सिल्वर मेडल लिया।

जेसी कहती हैं- लोग अक्सर पूछते हैं कि मैं इतना दर्द कैसे सह लेती हूं? मेरा जवाब है- संघर्षों ने मुझे निखारा है। बरसों पहले मैंने ईटिंग डिसऑर्डर से जंग लड़ी थी। उस दौर की मानसिक पीड़ा के आगे रेस का दर्द कुछ भी नहीं। कम से कम रेस की एक फिनिश लाइन तो होती है, पर उस बीमारी का कोई अंत नहीं दिखता था। दर्द से जूझना मेरी ताकत है, पर खुद को सजा देना मेरी कमजोरी।

लोग सोचते हैं कि मैं दर्द इसलिए सहती हूं क्योंकि मेरे अंदर कोई अंधेरा है। ऐसा नहीं है। मैं इसलिए सहती हूं क्योंकि मैं आजाद हूं, खुश हूं। जब आप पहले से दर्द में हों, तब और दर्द नहीं सह सकते, लेकिन जब संतुलन में हों, तब आप सब कुछ झेल सकते हैं। इटली विंटर गेम्स मेरी आखिरी ओलिंपिक रेस हैं। मैं आंखों में चमक और दिल में वही पुराना जुनून लेकर उतरने जा रही हूं। फेफड़े जलेंगे, मांसपेशियां आग की तरह दहकेंगी, पर मुझे पछतावा नहीं होगा क्योंकि मैं जानती हूं कि मैंने अपना सब कुछ इस बर्फ को दिया है।

मन खुश तो गहरा दर्द भी सह सकते हैं

जेसी कहती हैं- शरीर का दर्द तो पलभर का है जो फिनिश लाइन पर थम जाएगा, पर मानसिक हार का मलाल उम्रभर रहता है। मैं कमजोरी को नहीं, खुशी को ताकत बनाती हूं; क्योंकि मन खुश हो, तभी इंसान सबसे गहरा दर्द सह सकता है।

शरीर को निचोड़ लेती है रेस

मिशिगन यूनिवर्सिटी की फिजियोलॉजिस्ट लॉरा रिचर्ड्सन कहती हैं,‘क्रॉस-कंट्री स्कीइंग शरीर की सहनशक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा है। कड़ाके की ठंड में हाथ-पैर और दिल एक साथ चरम पर काम करते हैं। यह खेल शरीर को इस कदर निचोड़ देता है कि खिलाड़ी अक्सर दृष्टि खोने और बेहोशी की कगार पर पहुंच जाते हैं। रेस शरीर को उस सीमा तक ले जाती है कि मांसपेशियों के ऊतक तक फट जाते हैं और शुगर की भारी कमी हो जाती है। इस स्थिति से उबरने में हफ्तों लग सकते हैं।’

Advertising