‘हुजूर’ के सामने बार-बार फजीहत होती बिहार पुलिस, अपना काम भूल गए या आदत बन गई?

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‘हुजूर’ के सामने बार-बार फजीहत होती बिहार पुलिस, अपना काम भूल गए या आदत बन गई?

पटना : कहा तो जाता है कि अगर पुलिस चाह दे तो किसी की चप्पल की चोरी नहीं हो सकती। वहीं, पुलिस अगर अपना पेशेवराना अंदाज भूल जाए तो समाज जंगल बन सकता है। जंगल का एक ही कानून होता है, जिसकी लाठी, उसकी भैंस। 43 साल में पुलिस ने अपना काम नहीं किया तो जज साहब को गुस्सा आ गया। उन्होंने सासाराम के प्रभारी एसपी सरोज कुमार साह को पांच घंटे तक ज्यूडिशियल कस्टडी में रखने का आदेश दिया। बिहार पुलिस के फजीहत का ये कोई पहला मामला नहीं था। थानेदार से लेकर एसएसपी और कमिश्नर से लेकर डीजीपी तक कोर्ट की कटघरे में खड़े हो चुके हैं। इन घटनाओं से ऐसा लगता है कि या तो पुलिस अपना काम भूल गई या फिर उसे बार-बार फटकार झेलने की आदत पड़ गई है।

पांच घंटे तक ज्यूडिशियल कस्टडी में रहे प्रभारी एसपी
बिहार पुलिस के फजीहत होने का ताजा मामला सासाराम से जुड़ा हुआ है। रोहतास जिले का व्यवहार न्यायालय (एडीजे कोर्ट) में एक मर्डर केस की सुनवाई चल रही थी। एसपी आशीष भारती के छुट्टी पर रहने की वजह से प्रभारी एसपी सरोज कुमार साह अदालत में पेश हुए। केस में तामिला प्रतिवेदन (कार्रवाई रिपोर्ट) न होने पर कोर्ट ने उन्हें पांच घंटे तक न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश दे दिया। इसके बाद पुलिस-प्रशासन में खलबली मच गई। दरअसल, हत्या के 43 साल पुराने मामले में कोर्ट ने आरोपी को गिरफ्तार, और गिरफ्तारी नहीं होने पर कुर्की-जब्ती का आदेश दिया था। साथ ही की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने को कहा था। इतनी-सी बात थी। प्रभारी एसपी बिना किसी रिपोर्ट के देह लेकर कोर्ट में पहुंच गए।

43 साल में आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी पुलिस
नसारीगंज के अतमीगंज गांव में 1979 में रामानुज सिंह उर्फ छेदी सिंह की कुछ लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में 18 सितंबर 1979 को छह नामजद आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था। तब से कोर्ट में मामला चल रहा है। सुनवाई के दौरान हत्या के मामले में चार नामजद आरोपियों की मौत हो गई। मामले की सुनवाई में दो आरोपियों लक्ष्मी नारायण मास्टर और राम निवास सिंह की पेशी अदालत में लंबित है। दोनों आरोपियों को पुलिस न तो गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर सकी और ना ही कोर्ट की ओर से जारी कुर्की-जब्ती पर कोई अमल हो सका। इस केस की निगरानी पटना हाईकोर्ट कर रहा है। उच्च न्यायालय ने सात अप्रैल 2022 को सत्र अदालत को आदेश दिया था कि वो इस मामले को तीन महीने के अंदर समाप्त करे। प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) सासाराम मनोज कुमार की निचली अदालत ने दोनों आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। लेकिन पुलिस ऐसा करने में नाकाम रही। उसने वही किया जो पिछले 43 साल से करती आ रही है।

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जब HC ने SSP को तलब किया तो 24 घंटे में ढूंढा

सासाराम ही नहीं मुजफ्फरपुर से पटना तक पुलिसिया रवैये पर अदालत का डंडा चल चुका है। सालभर से लापता नाबालिग को जब मुजफ्फरपुर पुलिस नहीं ढूंढ पाई तो मामला पटना हाईकोर्ट तक पहुंचा। मई 2022 में एसएसपी जयंतकांत के कटघरे में खड़ा होने की बारी आई तो जो काम 14 महीने में नहीं हुआ था वो 24 घंटे में कर लिया गया। मतलब लापता लड़की को खोज लिया गया। ये नाबालिग आश्रमघाट से गायब हो गई थी। मुंबई के रायगढ़ जिला के उड़ैन थाना क्षेत्र में मिली। उसके अपहरण का आरोपी दिल्ली में बस चुका, सीतामढ़ी निवासी सोनू कुमार ने शादी कर ली थी। कोर्ट के चाबुक का ये असर हुआ कि मुंबई से हवाई जहाज के जरिए लड़की को बिहार लाया गया। कोर्ट ने करंट लोकेशन तक की पुलिस से डिमांड की। पिता के आवेदन पर पुलिस ने नौ मार्च 2021 को एफआईआर दर्ज की थी। एक आरोपी को तो गिरफ्तार किया गया लेकिन लड़की को बरामद करने में पुलिस इंट्रेस्ट नहीं दिखा रही थी। पटना हाईकोर्ट में एसएसपी की पेशी की नोटिस के साथ ही लड़की भी मिल गई। ये अपने-आप में आश्चर्य है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुलिस से काम कराने के लिए बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा?

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आनंद किशोर को ड्रेस की वजह से लगी थी फटकार

कार्रवाई और कोर्ट को लेकर बेपरवाह सिर्फ पुलिस ही नहीं है बल्कि बड़े ब्यूरोक्रेट्स भी काफी कैजुअल अप्रोच रखते हैं। जून 2022 में बिहार के प्रधान सचिव (शहरी विकास) आनंद किशोर उनके ‘अनुचित’ ड्रेसिंग कोड के लिए फटकार लगी थी। तब आनंद किशोर का वीडियो काफी वायरल हुआ था। हाईकोर्ट की कार्यवाही के दौरान वो शर्ट पहनकर आए थे, जिसका कॉलर खुला था। इस बात से सुनवाई कर रहे पटना हाईकोर्ट के जज काफी नाराज हो गए थे। उन्होंने कहा था कि ‘क्या आप नहीं जानते कि आपको कोर्ट में कौन सा ड्रेस कोड पहनना है? क्या आपको लगता है कि ये एक सिनेमा हॉल है?’ दरअसल, ये घटनाएं बताती है कि हमारे अधिकारी चीजों को लेकर कितने गंभीर हैं?

झंझारपुर जज पिटाई मामले में FIR को लेकर HC नाराज

पुलिसिया कारस्तानी की बानगी यहीं नहीं रूकी। झंझारपुर के एडीजे अविनाश कुमार के साथ पुलिस की बदसलूकी मामले में नया मोड़ आ गया। डीजीपी, एसपी और आईओ को पटना हाईकोर्ट ने तलब कर डाला। मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश एस कुमार की खंडपीठ ने आश्चर्य व्यक्त किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि बिहार पुलिस ने झंझारपुर के एडीजे अविनाश कुमार पर FIR दर्ज की है। कोर्ट को बताया गया कि पुलिसकर्मियों के बयान पर जज के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। फिर पटना हाईकोर्ट ने पूछा कि आखिर किस कानून के तहत जज के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई? सरकारी वकील इस सवाल का जवाब नहीं दे सके। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट समेत देश के कई हाईकोर्ट ये आदेश दे चुके हैं कि किसी न्यायिक पदाधिकारी के खिलाफ तभी कोई एफआईआर दर्ज की जा सकती है, जब उसकी मंजूरी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दें। झंझारपुर के एडीजे अविनाश कुमार की पिटाई के मामले एफआईआर को लेकर इस नियम का पालन नहीं किया गया। झंझारपुर के एडीजे अविनाश कुमार और पुलिसवालों का विवाद 18 नवंबर 2021 को हुआ था। इसमें आरोप है कि एडीजे के चैंबर में घुसकर घोघरडीहा थानाध्यक्ष गोपाल कृष्‍ण और एएसआई अभिमन्‍यु कुमार शर्मा ने मारपीट की थी।

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