संस्कृत की पढ़ाई के लिए शहर के छात्र कर रहे वृंदावन, वाराणसी, हरिद्वार का रुख | students turning to Vrindavan, Varanasi, Haridwar to study Sanskrit | Patrika News

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संस्कृत की पढ़ाई के लिए शहर के छात्र कर रहे वृंदावन, वाराणसी, हरिद्वार का रुख | students turning to Vrindavan, Varanasi, Haridwar to study Sanskrit | Patrika News

अध्यात्म के प्रति बढ़ते रुझान व रोजगार के नए नए अवसरों के साथ ही जबलपुर व आसपास के क्षेत्र में संस्कृत अध्ययन के प्रति रुचि खासी बढ़ी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संस्कृत शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान मिलने के बाद इसका पाठ्यक्रम भी पहले की तुलना में सुगम हो गया है। इसके बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संस्कारधानी में संस्कृत की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था व संसाधन नहीं हैं। इसके चलते यहां के छात्र संस्कृत की उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में वृंदावन, वाराणसी व हरिद्वार की ओर रुख कर रहे हैं।

रोजगारपरक हुई संस्कृत शिक्षा, शहर में बढ़े संस्कृत विद्यार्थी, संसाधनों के अभाव में बाहर अध्ययन के लिए विवश
जबलपुर।
अध्यात्म के प्रति बढ़ते रुझान व रोजगार के नए नए अवसरों के साथ ही जबलपुर व आसपास के क्षेत्र में संस्कृत अध्ययन के प्रति रुचि खासी बढ़ी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संस्कृत शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान मिलने के बाद इसका पाठ्यक्रम भी पहले की तुलना में सुगम हो गया है। इसके बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संस्कारधानी में संस्कृत की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था व संसाधन नहीं हैं। इसके चलते यहां के छात्र संस्कृत की उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में वृंदावन, वाराणसी व हरिद्वार की ओर रुख कर रहे हैं।
छात्रों, अभिभावकों का बढ़ता रुझान-
ज्योतिषाचार्य जनार्दन शुक्ला बताते हैं कि अध्यात्म व धर्म के प्रति बढ़ती आस्था की वजह से संस्कृत अध्ययन का महत्व बढ़ा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संस्कृत को सम्मानजनक स्थान मिला है। बदलते परिवेश में संस्कृत शिक्षा से कई रोजगार जुड़ गए हैं। पहले संस्कृत शिक्षा के बाद व्यक्ति कर्मकांड ही कर सकता था। अब इसके अधिक रोजगारपरक होने के चलते अभिभावकों व छात्रों की रुचि इसकी ओर बढ़ी है। शुक्ला का कहना है कि हर साल शहर में करीब एक हजार छात्र संस्कृत अध्ययन आरम्भ कर रहे हैं।
शहर में नहीं व्यवस्था, संसाधन-
शहर में संस्कृत अध्ययन के लिए छात्रों की संख्या की तुलना में संस्कृत स्कूलों की संख्या नाकाफी है। भेड़ाघाट में एक, ग्वारीघाट में 2 व सिविक सेंटर मढ़ाताल में एक संस्कृत स्कूल है। करौंदी व कटंगी में भी एक- एक स्कूल है। इनको मिलाकर जिले में कुल 5 संस्कृत विद्यालय हैं। संस्कृत में शास्त्री डिग्री के छात्र पुष्पराज चतुर्वेदी कहते हैं कि इन सभी स्कूलों की क्षमता से कई गुना छात्र हर साल संस्कृत की पढ़ाई आरम्भ करते हैं। यहां समुचित व्यवस्था व संसाधन न होने के चलते यहां के छात्र संस्कृत अध्ययन के लिए उत्तर भारत के शहरों का रुख कर रहे हैं।
सभी वर्ग के छात्र, छात्राएं भी-
संस्कृत अध्ययन अब ब्राह्मण जाति विशेष के लिए नहीं रह गया है। संस्कृत स्कूलों में अब हर जाति के छात्र संस्कृत अध्ययन कर रहे हैं। छात्राओं का भी इस ओर रुझान बढ़ा है और वे भी बड़ी संख्या में संस्कृत पढ़ रही हैं। उनका कहना है संस्कृत का उपयोग बढ़ा है, इसलिए छात्र भी बढ़ रहे हैं।
संस्कृत महाविद्यालय में नहीं हैं कोर्सेज-
शहर में संस्कृत की उच्चशिक्षा के लिए भी महज एक ही महाविद्यालय है। जानकारी के अनुसार नगर निगम संचालित पंडित लोकनाथ शास्त्री संस्कृत महाविद्यालय में भी शिक्षकों की कमी है। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ नर्मदा प्रसाद शर्मा बताते हैं कि पहले की अपेक्षा उनके महाविद्यालय में भी शास्त्री व आचार्य डिग्री करने के लिए छात्रों की संख्या बढ़ी है। इस महाविद्यालय में फिलहाल 173 छात्र अध्ययनरत हैं। इनमे से 9 छात्राएं हैं।महाविद्यालय में ब्राह्मणों के साथ अन्य जातियों के छात्र-छात्रा भी हैं।
नही होते डिप्लोमा, सर्टिफिकेट कोर्स-
डॉ शर्मा ने बताया कि स्थानीय संस्कृत महाविद्यालय में केवल स्नातक(शास्त्री) व स्नातकोत्तर(आचार्य) डिग्री कोर्स ही संचालित किए जाते हैं। जबकि आजकल कम अवधि के संस्कृत के कई रोजगारपरक सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स संचालित हो रहे हैं। एक माह से लेकर एक वर्ष तक के ये कोर्स कर छात्र रोजगार आरम्भ कर सकते हैं। अन्य रोजगारों की भी राह प्रशस्त होती है। लेकिन स्थानीय लोकनाथ शास्त्री संस्कृत महाविद्यालय में इन डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स की व्यवस्था नहीं है। इनके अध्ययन के लिए यहां के छात्र बाहर का रुख करने पर विवश हैं।
बाहर हैं अच्छी व सस्ती व्यवस्था-
संस्कृत के अध्ययन के लिए यहां से हर साल बड़ी संख्या में वृंदावन, वाराणसी व हरिद्वार जैसे शहर जाते हैं। स्नातकोत्तर डिग्री आचार्य के छात्र सन्दीप मिश्रा बताते हैं कि जबलपुर की तुलना में इन जगहों पर संस्कृत अध्ययन के लिए व्यवस्थाएं बेहतर हैं और सस्ती भी। इन शहरों में कई आश्रम संस्कृत की शिक्षा निशुल्क देते हैं। इन आश्रमो में आवासीय व भोजन आदि की भी व्यवस्थाएं उत्तम हैं। यहां अध्ययन के दौरान वेदमन्त्रों का ज्ञान हो जाने के चलते स्थानीय यज्ञ, अनुष्ठानों में सम्मिलित होने पर इन्हें दक्षिणा के रूप में आय भी होती है। इस वजह से भी यहां के छात्र वहां अध्ययन के लिए जा रहे हैं।

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