शराबबंदी या जानलेवा मजाक: दोगुने दाम पर बिकता है दारू, जहरीली पीकर मरते हैं लोग, हजारों करोड़ का नुकसान अलग

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शराबबंदी या जानलेवा मजाक: दोगुने दाम पर बिकता है दारू, जहरीली पीकर मरते हैं लोग, हजारों करोड़ का नुकसान अलग

बिहार में नीतीश कुमार की शराबबंदी व्यवहार में एक कानून और उसके उल्लंघन पर गिरफ्तारी, जेल और सजा या जुर्माना भर का मामला बनकर रह गई है। यूपी से लेकर बंगाल और झारखंड तक, बिहार को आने वाली हर सड़क के रास्ते ट्रक में भर-भरकर शराब आती है और गांव-गांव तक पहुंचाकर बेची जाती है। यहां तक कि बड़े विदेशी ब्रांड्स भी स्पेशल डिमांड पर मिल जाते हैं। इसके बाद भी अगर राज्य सरकार जिद पर अड़ी है कि शराबबंदी तो जारी रहेगी तो उसकी कीमत बिहार के लोग ही चुकाएंगे। कोई जान देकर चुकाएगा, कोई दोगुना दाम देकर चुकाएगा और खुद बिहार राजस्व की कमाई गंवाकर चुकाएगा।

शराबबंदी का जमीनी सच यही है कि आप चाहें तो शराब माफिया आपको नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री आवास और राजभवन के बीच बने गोलंबर के सामने आपके हाथ में शराब की बोतल पकड़ा जाएगा और आप चाहें तो आपके घर के दरवाजे पर डिलीवर करवा देगा। जो शराब की बोतल रांची, गोरखपुर या मालदा में 800-1000 रुपए की मितली है वो बिहार में आपको 2000-2500 की पड़ेगी। सामान असली होगा या नकली, इसकी गारंटी भी नहीं है। लेकिन शराब का इंतजाम जब चाहें, जहां चाहें, जितनी चाहें, बिहार के हर कोने में हो सकता है। 

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शराबबंदी कानून शराब पीने या बेचने पर गिरफ्तारी और सजा का प्रावधान करता है। यही इसकी ताकत है और यही इसकी सीमा भी। घर में पीकर कोई सोता रहे तो कौन सी पुलिस उसे पकड़ लेगी। पीकर सड़क पर भी निकल गए तो पकड़ लिए जाएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है क्योंकि हजारों लोगों की भीड़ में पी रखे लोगों की पहचान करना पुलिस के वश की बात नहीं है। गाहे-बगाहे चौक-चौराहों पर चेकिंग में कोई पकड़ लिया जाए तो मामला उसकी किस्मत का है, चौकसी का नहीं। पहली बार पकड़े जाने पर जुर्माना पर भी छूट जाने का रास्ता खुला हुआ है। 

शराबबंदी वाले राज्य में शराब का धंधा कर रहे लोग भी गिरफ्तारी के खौफ से ऊपर उठ चुके हैं। ऐसा कौन सा धंधा होगा जिसमें कमाई 100 फीसदी से भी ज्यादा हो। 100 रुपया लगाओ तो 100 रुपया ऊपर से कमाओ। हर काम के लिए चढ़ावा और घूस लेने के लिए बदनाम बिहार पुलिस के अधिकारी हों या सिपाही, उन्हें घर बिठाए कमाई हो रही है। हर ट्रक पर कमाई है, हर बोतल पर कमीशन है। तो पकड़ेगा कौन।जहरीली शराब से मौत की कोई घटना हो जाती है तो सरकार सख्त बयान देती है। फिर एसपी भी सख्त हो जाते हैं और फिर थानेदार एक ट्रक या कुछ कार्टन शराब पकड़ लेता है। उसी माफिया का एक ट्रक या बीस-चालीस कार्टन पकड़ा जाता है जिसके सैकड़ों ट्रक पहले उसी थानेदार के इलाके में बेधड़क आए हैं। 

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पुलिस और माफिया के बीच शराब पकड़वाने का भी खेल आपसी समझदारी से चल रहा है। थाने और पुलिस की इज्जत बची रहे और धंधा भी चकाचक चलता रहे। नहीं तो इस कमाई के तार थाने से लेकर एसपी के दफ्तर तक और पटना में अधिकारियों से लेकर नेताओं तक से जुड़े हैं। यह सारा खेल राजनीतिक संरक्षण के बिना चल रहा है, ये मान लेना बेवकूफी होगी। सरकार को शराब से जो राजस्व मिलता था अब वो माफिया राजनेता, शराब माफिया और पुलिस के बीच बंट रहा है। जब 2016 में नीतीश ने शराबबंदी की थी तो बिहार को उससे पहले साल शराब से 4000 करोड़ रुपए के लगभग की कमाई हुई थी। 

आज की तारीख में बिहार की शराब से कमाई 10000 करोड़ के आस-पास होती। लेकिन अब ये 10 हजार करोड़ की कमाई शराब के धंधे से जुड़े लोगों के हाथ लग गई है। पैसा ऊपर से नीचे तक बराबर पहुंच रहा है इसलिए राज्यों की सीमा पर सख्ती के ढोंग के बावजूद हर रोज बिहार में लाखों लीटर शराब आती है और बिक जाती है। अप्रैल, 2016 से फरवरी, 2022 तक बिहार में 2.09 करोड़ लीटर शराब पुलिस ने पकड़ी और 445165 लोगों को गिरफ्तार किया। बीजेपी सांसद सुशील कुमार मोदी ने छपरा में जहरीली शराब से मौत के बाद कहा है कि अब तक शराबबंदी कानून में 6 लाख लोग गिरफ्तार हुए हैं और एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। 

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नीतीश कुमार छपरा में बड़ी संख्या में जहरीली शराब से मौत के बाद भी कह रहे हैं कि जो पिएगा, वो मरेगा। ऐसी बातें वो पहले भी कर चुके हैं। बीजेपी कह रही है कि शराबबंदी की समीक्षा हो और समीक्षा का मतलब यह नहीं है कि वापस लो। समीक्षा हो इस बात कि जब शराबबंदी है तो शराब कहां से आ रहा है, कैसे आ रहा है, कौन आने दे रहा है। जब शराब बंद है तो हर तरह से बंद हो। बिहार में शराबबंदी की दिक्कत यही है कि पड़ोसी राज्य तो पड़ोसी हरियाणा तक से शराब पहुंच रही है। हजार, दो हजार किलोमीटर दूर से शराब लदी ट्रक बिहार में घुसता है, सैकड़ों किलोमीटर अंदर तक जाता है और शराब उतारकर लौट आता है। ये बिना पुलिस की सरपरस्ती के संभव नहीं है। इस सरपरस्ती की कीमत वसूल रहे लोग हर साल 10-20 हजार करोड़ का काला धन पैदा कर रहे हैं।

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