‘विधानसभा सचिवालय तक ही है उनकी सीमा…’ सत्यदेव पचौरी ने सतीश महाना पर फिर साधा निशाना, थमा नहीं है विवाद

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‘विधानसभा सचिवालय तक ही है उनकी सीमा…’ सत्यदेव पचौरी ने सतीश महाना पर फिर साधा निशाना, थमा नहीं है विवाद

कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर के दो कद्दावर नेताओं सांसद सत्यदेव पचौरी (Satyadev Pachauri) और विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना (Satish Mahana) के बीच चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। महाना और पचौरी के बीच वर्चस्व की जंग अब सार्वजनिक तौर पर सतह पर आ गई है। समग्र विकास को लेकर बुलाई गई बैठक पर विवाद पर दोनों पक्षों में तलवारें खिंच गई हैं। पचौरी ने एक बार फिर से महाना पर हमला बोला है।

कानपुर सांसद सत्यदेव पचौरी अलग-अलग विधानसक्षा क्षेत्रों में विकास कार्यों के शिलापट का अनावरण करने पहुंचे हुए थे। सवाल पर पचौरी ने कहा कि मैं सांसद हूं और संवैधानिक स्थिति के बारे में जानता हूं। उनकी (सतीश महाना) की सीमा केवल विधानसभा सचिवालय तक है। विकास कार्यों की समीक्षा का अधिकार सिर्फ मुख्यमंत्री या फिर प्रभारी मंत्री को होता है। इसलिए संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए कमिश्नर को बैठक रोकने के लिए पत्र भेजा था।

सत्यदेव पचौरी और विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के बीच एक बैठक को लेकर भले ही तलवारें खिंच गई हों, लेकिन राजनीतिक जानकारों की मानें तो दोनों के बीच सालों से रिश्ते सामान्य नहीं हैं। जानकारों का कहना है कि दोनों के बीच इस प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत 90 के दशक में ही हो गई थी। दोनों ने 2000 के दशक में कानपुर लोकसभा सीट से दावेदारी की। 2004 का लोकसभा चुनाव पचौरी हार गए। महाना पर कई तरह के आरोप भी लगे। 2009 में महाना लोकसभा चुनाव हारे तो उनके समर्थकों ने पचौरी पर निशाना साधा। कहा जा रहा है कि बीते कुछ सालों में विकास योजनाओं के लोकार्पण को लेकर भी दोनों के बीच खुलेआम ठनी हुई

बीजेपी के संगठन से जुड़े पुराने नेता महाना और पचौरी की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देते हैं। एक पूर्व पदाधिकारी कहते हैं कि 90 के दशक में एक चुनाव के दौरान सत्यदेव पचौरी की सीटीआई चौराहे पर महाना के एक करीबी से जोरदार बहस हो गई थी। यहां से दोनों के बीच पाले खिंच गए, जो अक्सर सार्वजनिक तौर दिखते हैं। ये जोर-आजमाइश चलती रही, तभी 2004 के लोकसभा चुनाव आ गए। लंबे वक्त से महाना और पचौरी बीजेपी से टिकट की दावेदारी कर रहे थे। बाजी पचौरी के हाथ लगी। श्रीप्रकाश जायसवाल से नजदीकी मुकाबले में पचौरी 5 हजार वोटों से हारे। पचौरी कैंप को लगा कि महाना साथ देते तो जीत मिल जाती।

2009 के लोकसभा चुनाव में सतीश महाना को बीजेपी ने कानपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया। मुकाबले में कांग्रेस से श्रीप्रकाश जायसवाल और बीएसपी से सुखदा मिश्रा थीं। आरोप है कि इस चुनाव में ब्राह्मण संगठनों को आगे कर लड़ाई लड़ी गई और महाना हारे। महाना कैंप ने पचौरी कैंप से नाखुशी जताई। 2014 के लोकसभा चुनावों में कानपुर से प्रत्याशी बने मुरली मनोहर जोशी, लेकिन दावेदारी महाना की भी थी। पचौरी ने जोशी को पूरा समर्थन दिया था। 2019 में महाना प्रदेश सरकार में मंत्री थे, लेकिन लोकसभा टिकट मिला पचौरी को। पचौरी जीत गए, लेकिन खींचतान चलती रही।

संगठन के लोगों के अनुसार, महाना-पचौरी के बीच वर्चस्व की जंग अब सतह पर आ गई है। सार्वजनिक तौर पर ऐसा होना उचित नहीं है। एक जानकार का कहना है कि बीजेपी में कई अहम पदों पर रह चुके सत्यदेव पचौरी पुराने स्वयंसेवक और सख्त मिजाज हैं। महाना भी कद्दावर नेता हैं, लेकिन फिलहाल जारी जंग अगले महीने होने वाले निकाय चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनावों से जुड़ी हुई है। दिलचस्प बात यह भी है कि महाना का महाराजपुर विस क्षेत्र अकबरपुर-कानपुर लोकसभा सीट का हिस्सा है। जिसके सांसद देवेंद्र सिंह भोले हैं। वह भी महाना की बैठक में नहीं आए थे।

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