मैं खड़ा भी नहीं हो पा रहा… बदनतोड़ ट्रेनिंग के 15 दिन अर्जुन तेंदुलकर को जिंदगी भर रहेंगे याद

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मैं खड़ा भी नहीं हो पा रहा… बदनतोड़ ट्रेनिंग के 15 दिन अर्जुन तेंदुलकर को जिंदगी भर रहेंगे याद

नई दिल्ली: लगभग 13 वर्ष पहले जब सचिन तेंदुलकर अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर थे तो उनके साथ अक्सर क्रिकेट मैदान पर एक छोटा बच्चा अर्जुन दिखने लगा था। वह सीनियर क्रिकेटरों के साथ दौड़ता, भागता, ट्रेनिंग देखता और वह करने की कोशिश करता जो उसके पिता करते। कुछ ही समय में हर किसी को पता चल गया था कि बेटे ने अपने पिता की राह चुनी है। वह भी महान सचिन की क्रिकेटर बनना चाहता है। लेकिन यह राह कतई आसान नहीं थी, न है और न रहेगी, क्योंकि महान पिता का बेटा होने भर से सब कुछ हासिल नहीं हो जाता। इससे सचिन भी डरे रहे होंगे। वह जानते हैं कि कदम-कदम पर अर्जुन की तुलना उनसे की जाएगी, लेकिन अब जब बेटे ने डेब्यू मैच में शतक जड़ा तो वह खुश होंगे। यह आगाज अच्छा है।

IPL ऑक्शन में हुई थी अर्जुन तेंदुलकर की सार्वजनिक बेइज्जती!

अर्जुन पर पिता का साया किस कदर हावी था उसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इंडियन प्रीमियर लीग की नीलामी के दौरान गुजरात टाइटंस के हेड कोच आशीष नेहरा ने यह जानते हुए मुंबई इंडियंस के दांव पर दांव खेला कि उन्हें हर हालत में MI खुद से जोड़ेगी तो हॉल में बैठा हुआ हर शख्स हंसने लगा। यह देखने में सामान्य था, लेकिन असल में अर्जुन का मजाक बनाने जैसा था। अंजाने में ही सही, लेकिन नेहरा से यह हुआ। किसी भी खिलाड़ी के लिए यह मुश्किल वक्त होता है। सार्वजनिक तौर पर इस तरह के व्यवहार से कोई भी दबाव में आ सकता है। जब पूरे सीजन मुंबई इंडियंस का कैप उन्हें नहीं मिला तो लगा कि उनमें दम नहीं है।

चकाचौंध में गुम न हो जाए बेटा अर्जुन, सचिन को थी ‘आचरेकर’ की तलाश

मखमली पालने में पलने वाले अर्जुन को लेकर हर किसी को यही लगा कि वह भी उन क्रिकेटरों के बेटों की तरह ही चकाचौंध में गुम हो जाएंगे, लेकिन पिक्चर अभी बाकी थी। सितारों से भरी मुंबई टीम की ओर से मौका मिल नहीं रहा था तो उन्होंने गोवा का रुख किया। दूसरी ओर, सचिन तेंदुलकर भी समझ चुके थे कि अब समय आ गया है बेटे को अपने साए से दूर भेजा जाए और उसके लिए सही गुरु का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रही। अर्जुन को ऐसे आधुनिक कोच की जरूरत नहीं थी, जो उनके लिए टावल लेकर खड़ा रहे। सचिन चाहते थे कि गुरु आचरेकर जैसा हो। गलती पर थप्पड़ लगाना जानता हो।

और मिल ही गए हानिकारक बापू

ब्लास्टर ने यहीं मास्टर स्ट्रोक खेला और पहुंच गए युवराज सिंह के पिता योगराज के पास। कहा जाता है कि नवजोत सिंह सिद्धू जब टॉप पर थे और युवराज को लेकर योगराज उनके पास पहुंच तो उन्होंने यह कहते हुए ट्रेनिंग देने से इनकार कर दिया कि यह क्रिकेटर नहीं बन सकता (हालांकि बाद में सिद्धू का कहना था कि उन्होंने कम उम्र को देखते हुए ऐसा कहा था कि बाद में लेकर आना)। इसके बाद योगराज ने अपनी कड़ी ट्रेनिंग और जिद से बेटे को ऐसा क्रिकेटर बनाया कि करियर की शुरुआत में ही धोनी ने युवी की विध्वंसक बैटिंग देखकर कहा था कि उसने झारखंड के गेंदबाजों के धागे खोल दिए।

योगराज ने अर्जुन से कहा- 15 दिन भूल जाओ कि सचिन के बेटे हो

खैर, जब अर्जुन योगराज के पास पहुंचे तो उन्हें सबसे पहले जो बात सुनने को मिली वह यह थी कि 15 दिन के लिए भूल जाओ कि तुम सचिन के बेटे हो। युवी के कॉल करने पर योगराज सिंह ने अपने बड़े बेटे यानी सचिन (योगराज सचिन को अपना बड़ा बेटा मानते हैं) के लिए मोर्चा संभाला। ये दो सप्ताह बूट कैंप की तरह थे। बिल्कुल आर्मी ट्रेनिंग की तरह। सुबह 5 बजे उठना, दो घंटे दौड़ना और उसके बाद जिम सत्र। अर्जुन को कहा गया कि वह अपनी मांसपेशियों को टोन करने और चोट लगने की संभावना को कम करने के लिए अपने बॉडीवेट व्यायाम का उपयोग करें।

शुरू हुई कड़ी ट्रेनिंग, अर्जुन ने गेंद से ज्यादा बल्ले से किया प्रभावित

इस बारे में योगराज कहते हैं- मैंने उससे कहा था कि उसे अगले 15 दिनों के लिए भूल जाना चाहिए कि वह सचिन तेंदुलकर का बेटा है। मुझे लगता है कि कोचों ने उसका मजाक उड़ाया, क्योंकि वह तेंदुलकर का बेटा है। मैंने उससे कहा कि उसे अपने पिता के साए से बाहर निकलने की जरूरत है। अर्जुन ने ऐसा किया भी। वह उनके बताए गए हर ट्रेनिंग और प्रैक्टिस सेशन को करता रहा। अर्जुन ने नेट्स में योगराज को प्रभावित किया लेकिन बॉलिंग से नहीं, बल्कि बैटिंग से। यह वाकई हैरान करने वाला था, क्योंकि कई अन्य लोगों ने अर्जुन की गेंदबाजी की तारीफ की थी।

अर्जुन ने कहा- सर, मैं खड़ा नहीं हो पा रहा…
योगराज सिंह का मानना था कि अर्जुन बल्ले से कहीं अधिक विध्वंसक हो सकता है। इस पर उन्होंने तुरंत सचिन और युवराज को फीडबैक दिया। वह बताते हैं- मैंने सचिन को फोन किया और उनसे पूछा कि उन्होंने अर्जुन की बल्लेबाजी पर ज्यादा ध्यान क्यों नहीं दिया। योगराज कहते हैं- गेंदबाजी करते समय अर्जुन को पिंडली पर चोट लगी थी। डॉक्टर की रिपोर्ट में कोई फ्रैक्चर नहीं था। उन्होंने कहा, ‘सर, मैं खड़ा भी नहीं हो सकता’। इस पर मैंने उससे कहा कि आग की नदी में तैरे बिना तुम कभी सोना नहीं बनोगे।

गुस्सा में था या कुछ और… लेकिन मुझे मिल ही गई आग
वह आगे बताते हैं- मुझे नहीं पता कि यह गुस्से से था या क्या… लेकिन वह पूरी ताकत से गेंद को हिट करने लगा। उनमें से कुछ तो स्केटिंग रिंक और टेनिस कोर्ट (योगराज की अकादमी के निकट) तक गए।’ इस ट्रेनिंग के कुछ ही महीने बाद अर्जुन ने राजस्थान के खिलाफ 207 गेंदों में 120 रन बनाए। टीम के साथी सुयश प्रभुदेसाई के साथ 221 रन की साझेदारी की, जिन्होंने 416 गेंदों पर 212 रन बनाए। खैर, सफर का आगाज तो धांसू है, लेकिन रास्ता लंबा है। यह देखना के लिए काफी वक्त है कि इस अर्जुन में कितनी धार है।
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