फीकी न पड़े चांदनी चौक की पारंपरिक चमक

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फीकी न पड़े चांदनी चौक की पारंपरिक चमक

लेखकः अजेय कुमार
बीते 17 अप्रैल को चांदनी चौक पुनर्विकास परियोजना के एक हिस्से के तौर पर लालकिले से फतेहपुरी मस्जिद तक के 1.3 किमी रास्ते के सौंदर्यीकरण का उद‌्घाटन कार्यक्रम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हाथों होना तय था। कोरोना के बढ़ते खतरे को देखते हुए इस कार्यक्रम को फिलहाल टाल दिया गया है। सबसे पहले इस परियोजना का ख्याल दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के मन में आया था और उन्होंने इसके लिए एक विशेष फर्म (एसपीवी) खोली थी जिसे सभी कानूनी अधिकार प्राप्त थे। शीला दीक्षित के बाद परियोजना का काम दिसंबर, 2018 में शुरू हुआ। केजरीवाल सरकार के अनुसार इस पर लगभग 99 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।

इतिहास देखें तो लालकिले से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक के इस पूरे इलाके का डिजाइन 17वीं सदी में शाहजहां और उनकी बेटी जहांआरा ने तैयार किया था। 17वीं सदी में वहां जो दुकानें थीं, वे सब की सब अर्धचंद्र शक्ल की थीं। अधिकतर दुकानों में चांदी का व्यापार होता था। एक बात और, तब लालकिले से फतेहपुरी मस्जिद तक एक नहर बहती थी, उसमें चांद की परछाईं वातावरण में मद्धिम चांदनी बिखेरती थी। यही कारण रहा कि इस क्षेत्र का नाम चांदनी चौक रखा गया। आज उस रास्ते पर न वे अंर्द्धचंद्र शक़्ल की दुकानें हैं और न ही वह नहर!

CHANDANI CHOWK -

चांदनी चौक के पुनर्विकास की शुरुआत में उस 1.3 किमी रास्ते पर दुकानों के पुराने ढांचों को एकदम बदल दिया गया है। उनके स्थान पर आपको धातु और शीशे के बने चमचमाते हुए शो-रूम दिखलाई दे रहे हैं। चांदनी चौक का पूरा कायापलट हो चुका है। अब लगता नहीं कि आप मुगलों के बनाए गए किसी ऐतिहासिक शहर की गलियों में टहलने का लुत्फ उठा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि हम चांदनी चौक जैसे पुरानी दिल्ली के इलाके को किस रूप में देखते हैं। उसे कनाट प्लेस या साउथ एक्सटेंशन जैसे आधुनिक शॉपिंग केंद्र में बदल कर हम उसकी समृद्ध धरोहर से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे?

मुझे लगभग दो वर्ष पहले तुर्की की राजधानी अंकारा से लगभग 200 किमी की दूरी पर स्थित कैपाडोकिया की गुफाओं को देखने का मौका मिला। यूनेस्को ने 1985 में इन्हें वर्ल्ड हैरिटेज साइट का दर्जा दिया था। सुंदर, नुकीली चट्टानों के बीच गुफाएं तो अद्भुत थीं ही, पर मुझे हैरानी तब हुई जब मैंने इन गुफाओं के बीच में ही बने अति-आधुनिक सुविधाओं से लैस होटलों को देखा। वहां मैं दो दिन रहा। कमरों में बाथरूम, बेड, लाइट्स सभी आधुनिक। परंतु गुफा के किसी पत्थर पर कुछ भी लिखने या उसे छेड़ने की सख्त मनाही थी। यानी आप गुफा की विरासत का भी आनंद लें और साथ में तमाम सुविधाओं का भी। गुफाओं में पारंपरिक होम-मेड खाना उपलब्ध था। गुफाओं के बाहर लगभग 2000 साल पुरानी बीजान्टिन चर्च को भी ज्यों का त्यों रखा गया है। उसे देखने के लिए लंबी लाइनें हैं और टिकट भी।

इसी तरह, दक्षिण अमेरिका के देश इक्वेडोर की राजधानी क्विटो का एक हिस्सा पुराने भोपाल या पुरानी दिल्ली जैसा ही है। यह शहर के नए हिस्से से सांस्कृतिक स्तर पर कहीं अधिक समृद्ध है। यूनेस्को ने पुराने हिस्से को वर्ल्ड हैरिटेज साइट घोषित किया है। वहां की सरकार ने सभी पुरानी बिल्डिंगों को रिहाइशी स्थानों में बदल दिया है जहां बाहर से आ रहे पर्यटक रहना पसंद करते हैं। वहां रातों को पारंपरिक नाच-गाना, खाना-पीना चलता रहता है, पर वहां की बिल्डिंगों में एक भी पत्थर बदलने की इजाजत किसी को नहीं है।

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के डाउन-टाउन में जनांदोलन के चलते शहर के एक बड़े फ्लाइओवर को तोड़कर उसकी जगह एक पुरानी नहर को बहाल किया गया है।

हालांकि अपने यहां आज चांदनी चौक में पुरानी नहर की बहाली की मांग उठाना बचकानापन कहलाएगा लेकिन चांदनी चौक पुनर्विकास परियोजना में इलाके की धरोहर को बचाना एक अहम लक्ष्य होना चाहिए। जरूरी है कि दिल्ली सरकार इस पूरे इलाके की धरोहर के महत्व को समझकर इसे सरंक्षण दे और विभिन्न देशों के अनुभवों से सीख लेते हुए इसे एक अनूठे पर्यटक-स्थल में बदलने का प्रयास करे।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं



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