पढ़िए, एक ‘अनाथ’ के संघर्ष की कहानी, जिसे 7 साल लगे भारतीय पासपोर्ट पाने में

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पढ़िए, एक ‘अनाथ’ के संघर्ष की कहानी, जिसे 7 साल लगे भारतीय पासपोर्ट पाने में

नई दिल्लीः 29 साल के विशाल मृदुल मंडल बेहद खुश हैं। खुशी की वजह, 7 साल के बाद उनका पासपोर्ट बनकर आ गया है। यूं तो किसी के लिए पासपोर्ट बनना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं। मगर विशाल के लिए है। क्यों कि पासपोर्ट बनने के लिए उनके साथ जो हुआ, वो हर किसी के साथ नहीं होता। अब, विशाल की नाउम्मीदी को ‘उम्मीदों’ के पंख लगे हैं। इस पासपोर्ट से वो कब उड़ेंगे। यह खुशखबरी भी वो जल्द ही शेयर करेंगे, यह विशाल का हमसे वायदा है।

लेकिन विशाल के सपनों की उड़ान से पहले उनकी ‘जमीनी हकीकत’ से जिंदगी का सफरनामा देखते हैं। जहां से विशाल के ‘होने’ और ‘बनने’ की मार्मिक कहानी शुरू होती है। इसी कहानी के आखिरी छोर पर 7 साल की वो जद्दोजहद है। जिसमें वे 3 राज्यों में भटके। Change.org पर पासपोर्ट के लिए पिटीशन डाली, 30 हजार लोगों ने पिटीशन साइन की, समर्थन में उतरे। तब ‘अनाथ’ विशाल को ‘भारतीय’ होने की पहचान मिली।

यह पूरी कहानी, उन्हीं की जुबानी
वैसे तो माता पिता, नाते रिश्तेदार सब वेस्ट बंगाल के दक्षिण 24 परगना से हैं। लेकिन रिश्तेदारों से ही सुना है कि माता-पिता दिल्ली में ही रहते थे। मैं इकलौता ही बेटा था। जब मैं 6 साल का था। तब पता चला था कि मां का नाम आभा है और पिता का नाम अशोक मंडल। औरों से सुना है कि मेरे पिता रिक्शा चलाते थे। उनका निधन हो गया था। मां दरियागंज में किसी के यहां झाडू पोंछा करती थी। पिता की मौत के बाद मां ने किसी दूसरे से शादी कर ली थी, उसी के साथ कहीं चली गई। मां के चले जाने के बाद अक्सर मेरी एक मौसी मेरे बारे में सुध लेने आती जाती थी।

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हां… मैंने न मां को देखा, न कभी पिता को। जब होश संभाला। खुद को हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक ही पाया। मुझे अच्छे से याद है, कंधे पर मैला कुचैला प्लास्टिक का बोरा लटकाए पटरियों के आसपास खाली पड़ी बोतलें और प्लास्टिक कूड़ा बीनता था। रात होते ही स्टेशन पर ही सो जाता था। उन्हीं दिनों चाइल्ड लाइन 1098 की मुझ पर नजर पड़ी। वे पीसीआई नाम के डे केयर सेंटर में ले गए। सेंटर में पढ़ता था। वहां खाना भी मिलता था। खाने का लालच में डे केयर सेंटर में हर रोज खींच ले जाता। शाम को स्टेशन पर आकर सो जाता था। सेंटर में सोमाश्री मैडम ने देखा कि पढ़ने में अच्छा हूं। उन्होंने शेल्टर होम वजीराबाद भेज दिया। मैम ने ही एडमिशन कराया था।

वहां सिलाई, हैंडीक्राफ्ट की चीजें सीखाते थे। चूंकि वहां पांचवी तक पढ़ाई थी। इसलिए 2006 में वहां से बाल सहयोग नई दिल्ली में भेज दिया। बाल सहयोग में 2006 से दिसंबर 2008 तक रहा। वहां छठी में दाखिला लिया। वहां रहकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों जाने लगा। इंग्लिश स्पीकिंग और वोकेशनल ट्रेनिंग मिलती थी। बाल सहयोग के स्कूल में आठवीं तक पढ़ाई की। जब 16 साल की उम्र हुई तो वहां से 2010 में प्रयास जहांगीरपुर में भेज दिया। प्रयास में भी वोकेशनल ट्रेनिंग मिलने लगी। वहां हाउस कीपिंग और कुंकिंग की ठ्रेनिंग मिलती थी। चूंकि 18 साल का हो चुका था, इसलिए वहां से श्री अरविंदो आश्रम हॉजखास आ गया। वहां ढाई तीन साल रहा। ब्रेकरी, किचन का काम सीखा। वहां गर्मियों की छुट्टियों में गंधर्व महाविद्यालय में तीन महीने के लिए नृत्य व अन्य एक्टविटि के लिए भेजा जाता था। वहीं से नृत्य और रॉक लाइनिंग सीखा। 2014 में अपने लिए मुंबई में जॉब ढूढीं। साथ ही साथ डांस ट्रेनिंग के लिए मुंबई के कोरियोग्राफर श्यामक डावर स्कॉलरशिप जीती। अवार्ड शो में हिस्सा में लिया।

अब मुंबई से शुरू होता है पासपोर्ट के लिए संघर्ष
उन्हीं दिनों मुंबई में कुकिंग, हाउस कीपिंग का काम करने वाले साथ के लड़के विदेशों में जॉब के लिए जा रहे थे। मेरे मन में भी उम्मीद जगी। जहां पर रहता था। वो नाइट शेल्टर था। वहां से पासपोर्ट के लिए आवेदन दिया। सारे दस्तावेज दिखाए। पासपोर्ट ऑफिस ने दस्तावेजों के साथ आवेदन ले लिया। लेकिन पुलिस वेरफिकेशन में यह कहकर रिजेक्ट कर दिया कि यह एक शेल्टर होम है। फिर उसके बाद ताज होटल में हाउस कीपिंग की जॉब करने लगा। वहीं, सर्वेंट क्वार्टर में रहता था। ताज होटल से पासपोर्ट के लिए एनओसी लेकर फिर से अप्लाई किया। परंतु फिर पुलिस वेरिफिकेशन के समय यह कहकर रिजेक्ट कर दिया यह कार्यस्थल है। जब देखा कि मुंबई से नहीं बन सकेगा। वापस दिल्ली आ गया।

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दिल्ली में जॉब ढूंढी। प्रयास संस्था से अनुमति ली। प्रयास से ही आवेदन दिया। पासपोर्ट डिपार्टमेंट ने कागज ले लिए। लेकिन पुलिस वेरिफिकेशन से रिजेक्ट हो गया, तर्क दिया कि आप 18 साल के हो चुके हो, इसलिए बाल गृह के एड्रेस से पासपोर्ट नहीं बनवा सकते। तब दस्तावेज के तौर पर आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और स्कूल प्रमाण प्रत्र था। दिल्ली से रिजेक्ट हुआ तो पश्चिम बंगाल चला गया क्यों कि वहां रिश्तेदार रहते थे। बड़ी मौसी के पास रहा। वहां सारे दस्तावेज फिर से बनवाए। नए सिरे से कोलकाता में आवेदन किया। पासपोर्ट डिपार्टमेंट ने सारे कागज लिए। लेकिन पुलिस ने वेरिफिकेशन करते हुए इस बार नागरिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए। लिहाजा, पासपोर्ट फाइल होल्ड कर दी गई। जैसे ही नागरिकता का सवाल आया। मैं दिल्ली लौटा।

आकर मुख्य पासपोर्ट अधिकारी, सचिव महिला बाल विकास विभाग भारत सरकार को पत्र भेजा। अनुरोध किया कि मैं अनाथ हूं। मुझे नागरिकता प्रमाणपत्र दिया जाए। या जन्म प्रमाणपत्र बनवाया जाए। इसके जवाब में भारत सरकार की जॉइंट सेक्रेटरी मुख्य सचिव वेस्ट बंगाल की सचिव को पत्र भेजा और मेरे मुद्दे पर संज्ञान लेने को कहा। यहां से फिर कोलकाता गया। मुख्य सचिव महिला बाल विकास पश्चिम बंगाल से मिला। उन्होंने कोई मदद नहीं की। आखिरी में पश्चिम बंगाल का पासपोर्ट रद्द हो गया। फिर से दिल्ली लौट अया। चूंकि मैं हमेशा गूगल पर कुछ न कुछ जीवन उपयोगी सर्च करता रहता था। वहीं से पिटीशन के लिए Change.org देखा। मैंने भी (Change.org/MeraPassport) पिटीशन शुरू की, और एक अधूरी सी कहानी लिखकर समर्थन मांगा। तब मुझे खुद नहीं पता था कि मेरी कहानी पर हजारों लोग समर्थन में उतरेंगे।

30 हजार से अधिक लोग मेरे समर्थन में उतरे और पिटिशन साइन की। इसका असर ये हुआ कि पिछले साल दिसंबर में सचिव दिल्ली महिला बाल विकास की तरफ से बाल कल्याण समिति के पास लेटर आया। अनाथ प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र बनाकर डिक्लेयरेशन का ऑर्डर दिया। फिर मजिस्ट्रेट ने इंक्वायरी की। पूरी जानकारी ली। जहां जहां संस्थान में रहा, वहां से कागजात मंगवाए। आखिर में मुझे अनाथ घोषित कर दिया गया। मेरी गार्जियनशिप बाल कल्याण समिति ने ली। उसी बेस पर 22 सितंबर 2022 को विशाल मृदुल मंडल का पासपोर्ट बनकर आ गया। विशाल हाल फिलहाल एक अमेरिकी नागरिक की कोठी में सर्वेंट हैं। अमेरिकी ने अपने साथ अमेरिका ले जाने का भरोसा दिया है। इसके अलावा विशाल खुद से क्रूशिप में जॉब के लिए अप्लाई कर रहे हैं।

आखिर में विशाल ने हमसे एक सवाल किया
वो सवाल हम सब से है। समाज से है, सिस्टम से है। ‘सर मैंने तो संघर्ष करके अपना पासपोर्ट व दस्तावेज बनवा लिया। लेकिन मेरे जैसे अनेकों अनाथ हैं, उनकी नागरिकता का क्या’।
जवाब…

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