नहीं रहे गाजीपुर की शान और प्रतिष्ठित लेखक डॉक्टर पीएन सिंह, 83 साल की उम्र में हुआ निधन

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नहीं रहे गाजीपुर की शान और प्रतिष्ठित लेखक डॉक्टर पीएन सिंह, 83 साल की उम्र में हुआ निधन

गाजीपुर : प्रगतिशील लेखक संघ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं हिंदी साहित्य की नामचीन हस्ती डॉ. पीएन सिंह का रविवार की शाम 83 साल की उम्र में निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों से वह अस्वस्थ चल रहे थे इलाज के लिए उन्हें गाजीपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उनका निधन हो गया। उनके निधन पर राजनीति, साहित्य और सामाजिक जगत के तमाम लोगों ने शोक संवेदना व्यक्त की है। गाजीपुर के पूर्व सांसद, वर्तमान में जम्मू के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने ट्विटर के जरिए डॉ. पीएन सिंह के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त की है।

डॉक्टर पी एन सिंह गाजीपुर की मुहम्मदाबाद तहसील के बासुदेवपुर गांव के मूल निवासी थे। उनका जन्म 1 जुलाई 1939 को बासुदेवपुर में हुआ था। कोलकाता यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए करने के बाद वह राजकीय डिग्री कॉलेज अगरतला में अध्यापक के तौर पर काम करने लगे। उसके बाद वह पीजी कॉलेज गाजीपुर में अध्यापक के तौर नियुक्त हो गए।

1971 में वह पीजी कॉलेज गाजीपुर में अंग्रेजी के प्राध्यापक के तौर पर कार्य करना शुरू किया और साल 2002 में इस संस्थान से वह रिटायर हो गए। इस दौरान उन्होंने हिंदी साहित्य में अपने दखल से राष्ट्रीय स्तर की पहचान बनाई। हिंदी आलोचक के नामचीन साहित्यकार डॉ. नामवर सिंह भी पीएन सिंह की विद्वता का लोहा मानते थे। कई कार्यक्रमों में उनके(पीएन सिंह) के बीज वक्तव्य से प्रभावित होकर नामवर सिंह मंच से ही डॉ. पीएन सिंह के प्रशंसा करने से अपने को रोक नहीं पाते थे।

डॉक्टर पीएन सिंह ने अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक होने के बाद भी हिंदी साहित्य पर केंद्रित करीब तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं। जिसमें नायपाल का भारत, गांधी अंबेडकर लोहिया, गांधी और उनका वर्धा, रामविलास शर्मा और हिंदी जाति, अंबेडकर प्रेमचंद और दलित, आदि उनकी प्रमुख रचनाएं हैं। डॉक्टर पी एन सिंह मार्क्स, गांधी और अंबेडकर के विचारों से बेहद प्रभावित थे। एक दौर में वह कम्युनिस्ट पार्टी के कैडर के तौर पर भी सक्रिय रहे। लेकिन कालांतर में उनका कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ाव हाशिए पर चला गया।

डॉ. सिंह को साल 2008 में पैरालिसिस होने के बाद भी वह नियमित साहित्य साधना में जुटे रहे। उनकी इस साहित्यिक यात्रा में उनके टाइपिस्ट उनके सूत्रधार रहे। बिस्तर पर लेटे-लेटे वह रोजाना डिक्टेशन देते और उनके टाइपिस्ट उनकी बीमारी के कारण लड़खड़ाती आवाजों का नोट बनाकर, उसे टाइप करते थे। इस तरीके से बीमारी के 14 साल में उनकी बीसियों किताबें प्रकाशित हुईं। इन सब बातों का जिक्र डॉक्टर पीएन सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘देहरी का दिया’ में भी किया है। अपने संस्मरण ‘देहरी का दिया’ में डॉक्टर पीएन सिंह ने अपने दौर के मशहूर कवि डॉक्टर केदारनाथ सिंह के साथ कई कार्यक्रमों में शामिल होने और दिल्ली में उनसे व्यक्तिगत मुलाकात के संस्मरणों को भी दर्ज किया है।

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देश के नामचीन पत्रकार उर्मिलेश ने अपने आत्मकथा का शीर्षक ‘गाजीपुर में क्रिस्टोफर कोडवेल’ डॉक्टर पीएन सिंह के शोध प्रबंध से प्रेरित होकर लिया है। इस बात का जिक्र खुद उर्मिलेश ने अपनी पुस्तक में किया है। पीएन सिंह ने राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर से क्रिस्टोफर कॉडवेल पर अपना शोध प्रबंध जमा कर पीएचडी की डिग्री हासिल की थी।

बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. सदानंद शाही के अनुसार एक दौर में डॉ. नामवर सिंह, डॉक्टर पीएन सिंह से इस कदर प्रभावित थे कि वह (नामवर सिंह) कहते थे कि अगर किसी को दलित साहित्य पर प्रमाणित काम करना हो तो वह गाजीपुर जाकर डॉक्टर पीएन सिंह से संपर्क कर लें। दलित साहित्य पर पीएन सिंह के वृहद अध्ययन का लाभ शोधार्थियों को जरूर मिलेगा। डॉक्टर पीएन सिंह के देहावसान के बाद साहित्य, सामाजिक और आम जनमानस सोशल मीडिया के जरिए अलग-अलग रूप में श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।
रिपोर्ट : अमितेश कुमार सिंह

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