दिल्ली की ‘विलुप्त’ नदी फिर से होगी जिंदा!

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दिल्ली की ‘विलुप्त’ नदी फिर से होगी जिंदा!

दिल्ली की ‘विलुप्त’ नदी फिर से होगी जिंदा!

नई दिल्ली: पिछले कुछ महीनों से राजधानी में यमुना के अलावा साहिबी नदी को बचाने की मुहिम चल रही है। आज के युवा इस नदी के बारे में नहीं जानते क्योंकि यह नदी दो दशक पहले ही सूख चुकी है। राजस्थान से हरियाणा होते हुए दिल्ली आने वाली इस नदी में 80 के दशक से ही बहाव नहीं है। एनबीटी ने दो दशक पहले सूख चुकी इस नदी के निशान ढूंढने की कोशिश। एक्सपर्ट के अनुसार नदी को फिर से जीवित किया जा सकता है लेकिन इसके लिए काफी काम करने होंगे। वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण नदी के वापस लौटने की बात से ही डर जाते हैं क्योंकि नदी के रास्तों पर अब पूरी तरह अतिक्रमण हो चुका है और नदी वापस आई तो बड़ी तबाही मचा सकती है।

साहिबी नदी

साहिबी सीकर (राजस्थान) के पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर जयपुर, अलवर, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहुंचती थी। यह मुख्य रूप से बरसाती नदी थी और बारिश में दौरान इसका तेज प्रवाह होता था। इस नदी में 1845, 1873, 1917, 1930, 1933, 1960, 1964, 1072 और 1977 में भारी बाढ़ आई। बाढ़ का पानी न सिर्फ नजफगढ़ बल्कि जनकपुरी तक भर गया था। उस दौरान दिल्ली के 72 गांवों और 33 कॉलोनियों में चेतावनी दी गई थी। आर्मी की सेवाएं लेनी पड़ी थी। 63 की बाढ़ के बाद इस नदी में पानी के बहाव को कंट्रोल करने के लिए कुछ बांध बनाए गए। इसके बाद से नदी में पानी आना कम हो गया। दिल्ली में साहिबी नदी की पहली बाढ़ 1964 में आई। इसकी वजह से यहां दो साल पहले बने बांध को भी नुकसान हुआ। इसके बाद इस नदी में 1077 में काफी पानी आ गया।

नजफगढ़ के ढासा में अब भी नदी के पानी के स्तर को दिखाने वाला स्केल है। नजफगढ़ झील को इसी नदी से पानी मिलता था और नजफगढ़ नाले के रूप में यह आगे बढ़ते हुए यमुना में मिलती थी। नदी में पानी न आने के बाद नजफगढ़ नाले में शहर की कॉलोनियों के गंदे नाले गंदगी घोलते रहे और यह साहिबी ने नजफगढ़ नाला बन गई।

हरियाणा के राष्ट्रीय राजमार्ग पर बना है बांध

नदी के बहाव को कंट्रोल करने के लिए दिल्ली-जयपुर हाइवे पर धारूहेड़ा के पास बांध बना। इस बांध में अब भी बरसाती पानी एकत्रित होता है। एक्सपर्ट के अनुसार अब भी यह नदी और प्राकृतिक पानी है। बारिश का पानी इस बांध में एकत्रित होता है। यह सीवरेज का पानी नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि प्रयासों से नदी को जिंदा किया जा सकता है।

रेवाड़ी कोटकासिम मार्ग पर राजस्थान हरियाणा से कट जाता था
इस नदी में बारिश के दिनों में जब प्रवाह आता था तो उसका सबसे बुरा असर रेवाड़ी कोटकासिम मार्ग पर पड़ता था। तेज बहाव से लगभग हर साल यह नदी इस मुख्य मार्ग से गुजरती थी। यही वजह रही कि नदी जब तक उफनती रही यह मुख्य मार्ग भी कच्चा रहा। नदी बंद होने के बाद अब इसे पक्का बना दिया गया है। नदी यहां राजस्थान और हरियाणा को अलग कर देती थी। इसकी वजह से राजस्थान के गांव में रहने वाले लोग हरियाणा से कट जाते थे। बसों को भी हरियाणा की सीमा में ही रोक दिया जाता था।

नदी के निशान

सड़क बनाने के दौरान भी इस बात का ख्याल रखा गया कि यदि नदी आए तो उसके पानी को जाने की जगह मिले। इसलिए सड़क पर कुछ जगहों पर पुलिया बनाई गई है। इस पुलिया के नीचे पाइप लगाए गए हैं ताकि पानी एक किनारे से दूसरे किनारे तक जा सके। सड़क यहां समतल न होने के साथ कुछ जगहों पर निचली है। ग्रामीण बताते हैं इन्हीं जगहों से नदी गुजरती थी। इस वजह से यह जगह निचली हैं। आसपास के गांवों में नदी के पानी के बहाव को रोकने के लिए बंद अब भी नजर आते हैं। कोटकासिम की मौजूदा चौकी के पास एक बंद है जिस पर पूरी तरह कब्जा हो चुका है। इसी तरह यहां मंदिर की दीवार से पानी न टकराए और गांव में न घुसे इसलिए यहां बंद बनाया गया था।

नदी पर हम 10 से 12 सालों से काम कर रहे हैं। दिल्ली में इस पर काम शुरू हुआ है। बात होनी शुरू हुई है। गूगल मैप में भी नदी को अब उसके नाम की पहचान मिली है। एनजीटी ने नजफगढ़ झील के लिए दिल्ली और हरियाणा को मिलकर एक एनवायरमेंटल प्लान तैयार करने को कहा है ताकि झील को संरक्षित किया जा सके। इसके बनने से झील के पानी के सोर्स पता होंगे और उन पर भी काम शुरू होगा। ऐसे में उम्मीद जगी है कि नदी एक बार फिर से जिंदा होगी। लेकिन इसके लिए काम भी काफी तेजी से करना होगा। नदी के बहाव क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करना होगा। धारूहेड़ा के पास जो बांध है वह अब भी हरा है। वहां पर भरा पानी प्राकृतिक है। वह सीवर या कचरा नहीं है। इसलिए नदी के जीवित होने की उम्मीद भी है।

डॉ सुमित डूकिया, असिस्टेंट प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ एनवायरमेंट मैनेजमेंट, आईपी यूनिवर्सिटी

क्या फर्क पड़ा ग्रामीणों पर

कोट कासिम के रवि प्रकाश अग्रवाल कहते हैं कि बचपन में साहिबी नदी को देखकर गुस्सा आता था। अब उसका महत्व पता चला है। पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है। यहां के खरबूजे और तरबूज बहुत मीठे होते थे। अब उनकी खेती नहीं होती। नदी के रास्तों पर कब्जा हो गया है। ऐसे में अब यदि नदी वापस आई तो भारी तबाही होगी। नदी का प्रवाह जैसे ही रुका कुएं बंद होते चले गए। हैंडपंप भी सूखते जा रहे हैं।

कोटकासिम नगर पालिका के चेयरमैन महावीर आचार्य ने बताया कि नदी आने के दौरान यहां खेती में सिंचाई करने की जरूरत नहीं महसूस होती थी। मिट्टी में इतनी नमी थी कि सिंचाई की जरूरत नहीं थी। पानी कुछ फुट पर ही था। अब वह लगातार नीचे जा रहा है। आसपास के कई गांवों में पानी की जबरदस्त कमी है। हालांकि नदी के न आने की वजह से कनेक्टिविटी में सुधार हुआ है। गांवों का विकास भी हुआ है।

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