डॉक्टर बी भट्टाचार्या: ऐसा डॉक्टर जो ना कभी अखबार पढ़ते ना कभी टीवी देखते, एक पैसे की फीस में करते मरीजों का इलाज

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डॉक्टर बी भट्टाचार्या: ऐसा डॉक्टर जो ना कभी अखबार पढ़ते ना कभी टीवी देखते, एक पैसे की फीस में करते मरीजों का इलाज

पटना: बिहार के जाने-माने होमियोपैथिक चिकित्सक डॉ. बी भट्टाचार्या का पटना के गुलबी घाट पर अंतिम संस्कार किया गया है। उनके भतीजे अंशुमान भट्टाचार्य ने पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी। देश-दुनिया में लोग डॉ. बी भट्टाचार्या के निधन से दुखी हैं। बिहार के ज्यादातर घरों के बड़े बुजुर्ग डॉक्टर बी भट्टाचार्या के निधन पर जिस तरह से दुखी हो रहे उसके बाद से नई जेनरेशन के बच्चों में उनके बारे में उत्सुकता जगी है। सर्च ईंजन Google और सोशल मीडिया के जरिए युवा डॉक्टर भट्टाचार्या के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश में जुटे हैं। युवा पाठकों का ख्याल रखते हुए ही नवभारत टाइम्स.कॉम ने डॉक्टर भट्टाचार्या के बारे में कुछ जरूरी जानकारी प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

एक पैसे की फीस से शुरू की प्रैक्टिस
डॉक्टर बी भट्टाचार्य ने बिहार की राजधानी पटना में महज एक पैसे की फीस के साथ प्रैक्टिस शुरू की थी। दुनिया से विदा होने तक उन्होंने प्रैक्टिस जारी रखा। पिछले कुछ साल से उनकी फीस तीन हजार रुपये हो गई थी। ज्यादा उम्र होने के चलते डॉक्टर साहब कुछ चुनिंदा मरीजों का इलाज करते थे। उनकी क्लिनिक की व्यवस्था संभालने वाले स्टॉफ ने बताया कि महीने की आखिरी तारीख को ही पूरे महीने के लिए अप्वाइंटमेंट बुक हो जाता था। उसके बाद डॉक्टर साहब पूरे महीने उसी अप्वाइंटमेंट के हिसाब से मरीजों का उपचार करते थे।

उन्होंने बताया कि डॉक्टर साहब की इतनी प्रसिद्धि थी कि अहले सुबह से नंबर लगता था। दूसरे शहरों और राज्यों से आने वाले मरीज होटल में ठहरने के बजाय पूरी रात क्लिनिक पर ही रुक जाते, ताकि समय रहते उन्हें अप्वाइंटमेंट मिल जाए।

पटना कैसे पहुंचे डॉक्टर बी भट्टाचार्य
डॉक्टर बी भट्टाचार्या मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे। साल 1924 में बिहारी साव लेन में डॉक्टर साहब का जन्म हुआ। उनके पिता पटना के फेमस बीएन कॉलेज में फिजिक्स के प्रफेसर थे। चार भाई और चार बहनों में बी भट्टाचार्या दूसरे नंबर पर थे। उनकी स्कूली पढ़ाई पटना कॉलेजिएट स्कूल से हुई। उन्होंने कुछ दिन पटना यूनिवर्सिटी के सबसे अच्छे आर्ट्स कॉलेज पटना कॉलेज से भी कुछ दिन पढ़ाई की। इसके बाद कोलकाता के एम भट्टाचार्या कंपनी में चीफ केमिस्ट के पद पर कुछ दिनों तक नौकरी की। साल 1949 में कोलकाता से पटना आकर उन्होंने अपने पिता से कुछ पैसे लिए और यहां होम्योपैथिक फॉर्मेसी शुरू की। अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस भी शुरू कर दी। 1965 में उन्होंने छोटे भाई के साथ मिलकर पटना के कदमकुंआ इलाके में क्लीनिक चलाना शुरू कर दिया।

1972 में डॉक्टर बी भट्टाचार्या पटना के पटेल नगर में अपना मकान बनाया और चहीं प्रैक्टिस करने लगे। 1978 में कदमकुंआ का क्लीनिक बंद कर केवल पटेल नगर स्थित अपने आवास पर ही मरीजों को देखना शुरू किया। 2019 में हार्ट की समस्या गंभीर हो जाने के बाद वह सिमित मरीजों का इलाज करते।

डॉक्टर अंशुमान भट्टाचार्या ने बताया कि डॉक्टर बी भट्टाचार्या बिहार राज्य होम्योपैथिक बोर्ड के पहले गैर राजनीतिक अध्यक्ष थे। उनके प्रयास से ही बीएचएमएस (होम्योपैथ) डॉक्टर को एमबीबीएस के बराबर का दर्जा मिला। वह होम्योपैथिक कॉलेज भी खोलना चाहते थे इसके लिए उन्होंने खगौल और सगुना मोड़ के पास 7 कट्ठा जमीन भी खरीदी थी, लेकिन जमीन बेचने वाले की बेईमानी के चलते यह सपना अधूरा रह गया।

डॉक्टर साहब ने ना कभी टीवी देखा और ना कभी अखबार के पन्ने पलटे
फैमिली के लोग और क्लीनिक की व्यवस्था देखने वाले स्टॉफ बताते हैं कि डॉक्टर बी भट्टाचार्या की पूरी दिनचर्या केवल होम्योपैथ के बारे में सोचने और मरीजों की समस्या दूर करने में बीतता था। डॉक्टर साहब ने पूरे जीवन ना कभी टीवी देखा और ना ही कभी अखबार के पन्ने पलटे। वह खाली समय में भी होम्योपैथ से जुड़े रिसर्च पेपर और किताबों का अध्ययन करते रहते।
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डॉक्टर बी भट्टाचार्या के सहयोगी रहे डॉक्टर रामजी सिंह ने बताया कि डॉक्टर साहब ने साइकिल पर होम्योपैथ की दवाईयां लेकर प्रैक्टिस शुरू किया था। शुरुआत में वह ज्यादातर गरीब तबके के मरीजों को इलाज करते थे। डॉक्टर साहब से बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, प्रफेसर जाबिर हुसैन जैसी शख्सियत बिल्कुल आम मरीज की तरह इलाज कराने आते थे।

इतने महान डॉक्टर, लेकिन बदन पर बिल्कुल साधारण कपड़े
आज के दौर में डॉक्टर प्रैक्टिस शुरू करते ही महंगी गाड़ियां, ब्रांडेड ड्रेस का शौक पाल लेते हैं। ऐसी सोच वाले डॉक्टरों के लिए डॉक्टर भट्टाचार्या मिसाल हैं। वह हमेशा साधारण कपड़े पहनते थे। जिस किसी ने उन्हें देखा वह हमेशा गेरुआ कुर्ता और लुंगी में ही नजर आए। डॉक्टरी के पेशे में होने के बावजूद वह ईश्वर को मानते थे। हर रोज प्रैक्टिस शुरू करने से पहले मां काली की पूजा किया करते थे। डॉक्टर साहब कहा करते थे कि इंसान को साधा जीवन उच्च विचार रखना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा मानव सेवा करना चाहिए।

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