कानपुर की इन्हीं गलियों में बीता राजू श्रीवास्तव का बचपन… गिल्ली-डंडा, कंचे और क्रिकेट खेल कर हुए बड़े

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कानपुर की इन्हीं गलियों में बीता राजू श्रीवास्तव का बचपन… गिल्ली-डंडा, कंचे और क्रिकेट खेल कर हुए बड़े

कानपुर: कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव (Comedian Raju Srivastav) का बचपन कानपुर की गलियों में बीता है। राजू का चुटकीला अंदाज उन्हें खास पहचान दिलाने में मददगार रहा। कानपुर की मिट्टी से उन्हे बहुत लगाव था। बचपन के दिनों में राजू श्रीवास्तव ने जमकर गिल्ली-डंडा, कंचे और क्रिकेट खेला है। इस बात का जिक्र खुद राजू श्रीवास्तव ने अपने कई शो में भी किया। कानपुर से उनकी बहुत यादें जुड़ी हैं। बल्कि यह कहा जा सकता है कि कानपुर राजू के दिल में बसता था।

उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद के चेयरमैन राजू श्रीवास्तव का परिवार किदवई नगर एम ब्लॉक में रहता है। राजू श्रीवास्तव के भाई काजू, चंद्रप्रकाश, दीपू श्रीवास्तव परिवार समेत कानपुर में ही रहते हैं। राजू श्रीवास्तव जब लखनऊ में होते हैं, तो उनका पैतृक आवास पर आना जाना लगा रहता है। राजू अपने चिरपरिचित अंदाज में दोस्तों से मुलाकात करते हैं। चाय की दुकान में बैठकर मंडली लगाते हैं।

राजू के मोहल्ले से कुछ दूरी पर रहने वाले एक बुजुर्ग बताते हैं कि आज से 30 से 35 वर्ष पहले किदवई नगर क्षेत्र का इतना विकास नहीं हुआ था। बगल में ही ओ ब्लॉक सब्जी मंडी थी, जिसकी वजह से थोड़ी रोनक रहती थी। चारो तरफ बंजर मैदान था। राजू को मैंने बचपन में गिल्ली-डंडा, कंचे और क्रिकेट खेलते हुए देखा है। उस बच्चे को मैंने कभी निराश नहीं देखा। राजू के चेहरे की मुस्कान को ध्यान से पढ़िए। उसकी मुस्कान ईश्वरीय देन है। राजू के चेहरे की मुस्कान दूसरों के चेहरे पर हंसी लाने के लिए बनी थी।

स्कूली मंच पर जरूर बुलाए जाते थे राजू
राजू श्रीवास्तव जब छात्र जीवन में थे, तो अपने चुटकीले अंदाज के लिए जाने जाते थे। उनका चुटकीला अंदाज और लोगों से अलग बनाता था। कॉलेज हो या फिर स्कूल का कोई कार्यक्रम, मंच पर राजू को जरूर बुलाया जाता था। राजू भी अपने जुमलों से साथी स्टूडेंट और टीचर को खूब गुदगुदाते थे। जिसकी वजह से लोग राजू के करीब आना चाहते थे। उनसे बाते करना चाहते थे, राजू ने अपने इसी अंदाज को पहचान बना लिया।

शाम को दोस्तों के साथ लगती थी मंडली
राजू श्रीवास्तव का बचपन किदवई नगर स्थित पैतृक आवास में बीता है। मोहल्ले में जब शाम के वक्त बिजली नहीं आती थी, तो राजू की दोस्तों के साथ मंडली लगती थी। राजू अपने जुमलों से दोस्तों को खूब हंसाते थे। उनकी हंसी ठिठौली देखकर मोहल्ले के लोग भी सुनने के लिए पहुंच जाते थे। ऐसे में राजू अपने चुटकीले अंदाज में कभी लोगों की टांग खीचते तो कभी खुद पर ही मजाक छोड़ते थे। मोहल्ले की भाभी हों या फिर बुजुर्ग, चाची-चाचा किसी को नहीं छोड़ते थे।
रिपोर्ट-सुमित शर्मा

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