कहां चला गया है मायावती का हाथी, यूपी चुनाव 2022 में अब तक नहीं सुनाई दी चिंघाड़?

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कहां चला गया है मायावती का हाथी, यूपी चुनाव 2022 में अब तक नहीं सुनाई दी चिंघाड़?

UP Election 2022: यूपी चुनाव (UP Chunav 2022) के दो चरण गुजर चुके हैं। मैदान में सभी प्रमुख दल ताल ठोंक रहे हैं। फिर चाहे बीजेपी, सपा, कांग्रेस हों या प्रदेश में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को बेताब आप और एआईएमआईएम। सभी पार्टियां पूरा दमखम दिखा रही हैं। पूरे सीन से सिर्फ एक दल नदारद है। मायावती की बीएसपी (BSP supremo Mayawati)। वो बीएसपी जो पिछले कई दशकों में राज्‍य की सत्‍ता के केंद्र में रही है। जिसके बगैर यूपी चुनाव की कल्‍पना करना भी मुश्किल था। लेकिन, 2022 यूपी चुनाव (UP Election 2022) में हाथी की चिंघाड़ अब तक सुनाई नहीं दी है। शायद यह पहली बार है। अप्रत्‍याशित भी। आखिर यूपी के पूरे चुनावी परिदृश्‍य से बहुजन समाज पार्टी (BSP) के गायब होने की क्‍या वजह हो सकती है।

कुछ लोग इसे मायावती के डर के साथ जोड़ रहे हैं। मायावती और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला चल रहा है। शायद बीएसपी सुप्रीमो पर इसी का दबाव है। बेशक वह बीच-बीच में आकर चुनाव में अपनी मौजूदगी की बातें करती रही हैं। लेकिन, वो सिर्फ रस्‍मी लगती हैं।

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शुरू से गुम है बीएसपी
बीएसपी के संदर्भ में चुनाव 2022 में कई बातें ध्‍यान देने वाली हैं। शुरू से ही उसका रवैया ऐसा रहा है जैसे वह लड़ाई में कहीं मौजूद ही नहीं है। निर्वाचन आयोग के चुनाव की तारीखों का ऐलान करने से पहले तक तकरीबन सभी दलों ने प्रदेश में माहौल बनाना शुरू कर दिया था। हरेक पार्टी रैली और जनसभाएं कर रही थी। लेकिन, इस दौरान बीएसपी कहीं नहीं दिख रही थी। मायावती ने इस बात को स्‍वीकार भी किया था कि चुनावी प्रचार में उसने देर से एंट्री की। हालांकि, उन्‍होंने यह भी भरोसा जताया था कि उनकी पार्टी जोरदार वापसी करेगी। उन्‍हें जीतने से कोई रोक नहीं सकता है।

एक और बात दिलचस्‍प है। मायावती ने अब तक जो कुछ रैलियां की हैं, उनमें मुख्‍य रूप से उनके निशाने पर कांग्रेस, सपा और अन्‍य पार्टियां रही हैं। वहीं, बीएसपी सुप्रीमो ने बीजेपी को करीब-करीब पूरी तरह से बख्‍श दिया है। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ पर भी उनके हमले बहुत तीखे नहीं रहे हैं। वह बहुत बच-बचकर बोली हैं।

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क्‍या चुनाव से आउट है बीएसपी?
माना जाता है कि चुनाव में बीएसपी की लेट एंट्री के बावजूद जाटव दलित पार्टी से जुड़े रहेंगे। हालांकि, गैर-जाटव दलित वोट बैंक के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती है। बीएसपी को सत्‍ता में लाने में इसकी भूमिका बहुत अहम थी। चुनाव से पहले तमाम ओपिनियन पोल में बीएसपी का प्रदेश में सफाया दिखाया गया था। हालांकि, जानकारों की राय इस मामले कुछ अलग है।

वो कहते हैं कि पिछले कई दशक से बीएसपी का वोटबैंक 20 फीसदी से ज्‍यादा रहा है। यूपी में 21 फीसदी आबादी दलितों की है। बीएसपी उत्‍तर प्रदेश में चार बार सरकार का हिस्‍सा रही है। 2007 में बहुमत के साथ उसने यूपी में अपनी सरकार बनाई थी। इस तरह की भी रिपोर्टें हैं कि पार्टी का काडर जमीनी स्‍तर पर चुपचाप काम कर रहा है। इनमें खासतौर से उसका फोकस ग्रामीण इलाकों में है। बहरहाल, अगले महीने यह साफ हो जाएगा कि वाकई ये बातें सही हैं या मायावती का हाथी अब थक चुका है।

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