एक-दो नहीं पूरे 5 फैक्टर… रवि शास्त्री से कितना अलग है राहुल द्रविड़ का कोचिंग स्टाइल

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एक-दो नहीं पूरे 5 फैक्टर… रवि शास्त्री से कितना अलग है राहुल द्रविड़ का कोचिंग स्टाइल

शास्त्री और द्रविड़ के कोचिंग स्टाइल में कई फर्क

राहुल द्रविड़ उस वक्त टीम इंडिया के हेड कोच बने, जब रवि शास्त्री 2021 में टी-20 वर्ल्ड कप के बाद अपनी पोजिशन छोड़ रहे थे। मिस्टर भरोसेमंद के नाम से मशहूर पूर्व दिग्गज बल्लेबाज द्रविड़ इस हाई प्रेशर जॉब के लिए हमेशा फिट परफेक्ट माने गए। इससे पहले वह नेशनल क्रिकेट अकादमी (NCA) में अपनी देखरेख में कई युवा क्रिकेटर्स को निखार रहे थे। मगर जूनियर क्रिकेटर्स को तराशना और सीनियर भारतीय टीम की कोचिंग करना, दो अलग-अलग जॉब है। गुजरते वक्त के साथ राहुल द्रविड़ को टीम इंडिया का हेड कोच बने सालभर से ज्यादा हो गया। ऐसे में आप भी ये जानने में जरूर दिलचस्पी दिखाएंगे कि कैसे राहुल द्रविड़ का कार्यकाल रवि शास्त्री से अलग है।

​#1. रिस्क लेना vs सेफ खेलना

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यह शास्त्री और द्रविड़ की कोचिंग स्टाइल में बड़ा अंतर रहा है। द्रविड़ जब भारतीय टीम से खेला करते तो हमेशा एक डिफेंसिव और सुरक्षित बल्लेबाज माने जाते, उनकी कोचिंग में भी यही स्टाइल झलकता है। दूसरी और रवि शास्त्री तब कप्तान रहे विराट कोहली के साथ जोखिम लेने के लिए तैयार रहते थे। भले ही फिर किसी टेस्ट मैच में आउट ऑफ फॉर्म चल रहे उपकप्तान अजिंक्य रहाणे को ही ड्रॉप करना क्यों न हो। शास्त्री-कोहली की जोड़ी ने जसप्रीत बुमराह को टेस्ट क्रिकेट में स्थापित करने का भी काम किया। इसके विपरीत, द्रविड़ ने आजमाए और परखे खिलाड़ियों पर ही विश्वास जताया। रुतुराज गायकवाड़ और संजू सैमसन जैसे खिलाड़ियों को अपने मौके के लिए इंतजार करना पड़ा है। भले ही उन्हें आजमाने के मौके मिले हों। टी-20 वर्ल्ड कप 2022 में भी थिंक टैंक का वेट एंड वॉच वाला रवैया टीम को महंगा पड़ा।

​#2. ऑलराउंडर vs प्रॉपर पेसर्स

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प्लान्स की बात करें तो शास्त्री और कोहली की जोड़ी ज्यादा एग्रेसिव नजर आती थी। दोनों ने टीम में कुछ नए तेज गेंदबाजों को शामिल किया। जसप्रीत बुमराह के साथ प्रसिद्ध कृष्णा, नवदीप सैनी और टी. नटराजन को इंटरनेशनल क्रिकेट में मौका दिया। दुर्भाग्य से डेब्यू के बाद कृष्णा और नटराजन इंजर्ड ही रहे। सैनी ने अपनी फॉर्म गंवा दी। यहां आपको राहुल द्रविड़ की कोचिंग स्टाइल में फर्क नजर आएगा। कप्तान रोहित शर्मा ने भी ऐसे बोलर्स को आजमाया जो बैटिंग भी कर सके। आवेश खान को कुछ खराब मैचों के बाद बाहर कर दिया गया। जबकि उमरान मलिक की टीम में तभी वापसी हुई, जब थिंक टैंक अपने सारे हथियार आजमां चुकी थी।

​#3. मुखर vs कूटनीतिक

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यह काफी स्पष्ट अंतर रहा है। अपने क्रिकेटिंग डेज से ही शास्त्री की इमेज ऐसी रही है, जो मन की बात कहने में कतई नहीं हिचकते। भले ही कोई उनके बारे में कुछ भी सोचे। दूसरी ओर पूरी दुनिया जानती है कि राहुल द्रविड़ किस नेचर के बंदे हैं। वह शांत हैं। गंभीर हैं। कूटनीतिक हैं। जब पूरी दुनिया जान चुकी थी कि रविंद्र जडेजा और जसप्रीत बुमराह इंजरी के चलते टी-20 विश्व कप 2022 नहीं खेल पाएंगे, तब भी वह आधिकारिक बयान जारी होने का इंतजार करते रहे। जब तक बीसीसीआई ने पुष्टि नहीं की तब तक कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

​#4. शक्ति-स्फूर्ति vs शांति

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अलग-अलग व्यक्तित्व होना शास्त्री और द्रविड़ की कोचिंग स्टाइल में अंतर का एक अहम फैक्टर है। रवि शास्त्री ऊर्जावान, भावुक और एक ऐसे व्यक्ति थे, जो खिलाड़ियों को एक अलग आजादी देते थे। प्लेयर्स को मैदान पर कैसे खेलना है ये नहीं बताते थे बल्कि मैदान पर दबाव रहित माहौल बनाने में मदद करते थे। इसके विपरीत, द्रविड़ जब कोच बने तो अपनी नई पारी वहीं से शुरू की जहां से छोड़ी थी। नतीजा चाहे जो भी हो, वह अधिकतर समय एक शांत आचरण और संयम बनाए रखने वाले प्लेयर रहे।

​#5. विवादों से दूर रहना

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यदि आपको कोई एक एरिया चुनना हो जिसमें द्रविड़ ने बतौर कोच अब तक शास्त्री को पछाड़े रखा है तो वह निश्चित रूप से यही डिपार्टमेंट है। शास्त्री-कोहली के कार्यकाल के दौरान, टीम में कथित दरार और खेमेबाजी की खबरें आते रहती थी। रोहित शर्मा और राहुल द्रविड़ यानी कोच-कप्तान की इस जोड़ी के कार्यकाल में ड्रेसिंग रूम का माहौल बढ़िया है। टीम में खुशहाल माहौल बनाने के लिए अनुभवी विकेटकीपर बल्लेबाज दिनेश कार्तिक ने कहा था, ‘मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही अलग टीम है (उसकी तुलना में जो उन्होंने वर्षों में अपनी यात्रा में देखी थी)। मुझे स्वीकार करना होगा कि मैं वास्तव में इस सेट-अप का आनंद ले रहा हूं।



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