आखिर इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं युवा? साक्षी मर्डर केस ने लड़के की बेहरमी पर उठ रहे हैं सवाल

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आखिर इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं युवा? साक्षी मर्डर केस ने लड़के की बेहरमी पर उठ रहे हैं सवाल

आखिर इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं युवा? साक्षी मर्डर केस ने लड़के की बेहरमी पर उठ रहे हैं सवाल

​क्यों आ गई इतनी हैवानियत?

युवाओं को प्यार पहले भी होता था, ब्रेकअप भी होते थे और गुस्सा भी आता था। मगर तब इस तरह बेरहमी से हत्या की खबरें नहीं आती थीं। मगर श्रद्धा मर्डर केस हो, निक्की मर्डर केस या अब साक्षी मर्डर केस, तीनों में प्यार करने वालों ने ही अपने साथी को बेरहमी से मार दिया। आखिर क्यों आजकल के युवा इस कदर हैवान बन रहे हैं? मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई वजहें हैं जो युवाओं के दिमाग पर असर डाल रही हैं। साइकॉलजिस्ट गीतांजलि शर्मा कई युवाओं की काउंसलिंग करती हैं। वह कहती हैं, ‘इस तरह की घटनाओं की कई वजहें होती हैं। सबसे पहले तो पैरंट्स अगर गुस्से वाले हैं और मारपीट या गाली गलौज करते हैं तो बच्चे में भी वही भावनाएं आएगी। वहीं कई लड़कों में एक इगो भी होता है कि कोई लड़की मुझे मना कैसे कर सकती है। फिर इस तरह के रिश्ते में अपनापन नहीं बल्कि ऑब्सेशन होता है। ऐसे में जब लड़की छोड़ना चाहती है तो लड़के बर्दाश्त नहीं कर पाते, यह उनके लिए इज्जत की बात बन जाती है। युवाओं में अकेलापन भी बढ़ गया है, तो कोई उनसे बात करने वाला या उनकी बात सुनने वाला नहीं है। उन्हें अब सिखाया नहीं जाता कि फेलियर, रिजेक्शन सामान्य चीज है। बच्चों को बस कॉम्पिटीशन और कम्पैरिजन सिखाया जाता है। यह सब वजहें आक्रामकता की वजह बन रही हैं।’ पीएसआरआई अस्पताल के सायकायट्रिस्ट डॉक्टर परमजीत सिंह कहते हैं, ‘आज भी समाज में पितृसत्तात्मकता हावी है। ऐसे में जब लड़के को लगता है कि लड़की उसके खिलाफ कुछ कर रही है तो वह सबक सिखाना चाहता है। सोशल मीडिया के चलते अच्छे दोस्त कम हो गए हैं। अब बच्चों को सिखाया जाता है कि तुम सब पर हावी रहो। कोई पैरंट नहीं चाहता कि उसका बच्चा बाहर पिटकर आए, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हर समस्या का हल झगड़ा नहीं है। बच्चों को सिखाएंगे कि तुम पीटकर आओ तो हम उसका ही नुकसान करेंगे।’

​क्या इनको डर नहीं लगता?

​क्या इनको डर नहीं लगता?

साक्षी मर्डर केस में अब तक आ रही मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपी साहिल ने हत्या से पहले वेब सीरीज देखी थी। इससे पहले श्रद्धा मर्डर केस में आरोपी आफताब ने भी हत्या से पहले वेब सीरीज़ देखने की बात कबूल की थी। तो क्या युवाओं के दिमाग पर इनका भी असर पड़ रहा है? गीतांजलि शर्मा कहती हैं, ‘हम जो कुछ देखते हैं, उसका भी अच्छा खासा असर हमारे दिमाग पर पड़ता है। आजकल जिस तरह का कॉन्टेंट तैयार हो रहा है, वह युवाओं को प्रभावित कर रहा है। पहले फिल्मों में दिखाया जाता था कि जो गलत कर रहा है, उसका अंजाम भी बुरा है। लेकिन अब दिखाते हैं कि जिसने क्राइम किया, वह खूब मजे करता है, सब उसकी गुलामी करते हैं, डरते हैं वगैरह। फिर पहले हीरो और विलेन के बीच साफ-साफ अंतर दिखता था। मगर अब किरदार भी ऐसे हो गए हैं कि हीरो और विलेन में अंतर ही पता नहीं लगता। विलेन भी हीरो बनकर घूमता है, वह पॉलिटिशियन भी बन जाता है, उसके पास पावर भी होती है। तो इन सबका साफ-साफ असर युवाओं के मन पर पड़ता है।’ आखिर इन युवाओं को डर क्यों नहीं लगता? इसके जवाब में वह कहती हैं, ‘जितने भी क्रिमिनल माइंडसेट के लोग होते हैं, उनमें पर्सनैलिटी डिसॉर्डर होते हैं। कुछ डिसॉर्डर ऐसे होते हैं जिनमें डर नहीं लगता है। जब उनके खिलाफ कुछ होता है तो उनके इमोशंस हावी हो जाते हैं। ध्यान रखें कि उनमें इमोशंस हावी होते हैं मगर फीलिंग्स नहीं होतीं। इसी के चलते वह अपने साथी को मारने जैसे कदम भी उठा लेते हैं।’ एशियन हॉस्पिटल की सायकायट्रिस्ट डॉक्टर मीनाक्षी मनचंदा कहती हैं, ‘इस तरह किसी की हत्या करना उसके खराब मानसिक स्थिति को दिखाती हैं। लोगों के अलग-अलग पर्सनैलिटी फीचर होते हैं जिसके चलते वह ऐसा कदम उठा सकते हैं। फिर जैसा समाज होता है, उसका असर युवाओं पर पड़ता है।’

कैसे सुधरेंगे ये हालात?

कैसे सुधरेंगे ये हालात?

युवाओं में आक्रामकता बढ़ रही है तो पैरंट्स कैसे इन स्थिति को सुधार सकते हैं? इसके लिए मेडिकल एक्सपर्ट्स कुछ तरीके बताते हैं:

-बच्चे छोटे हैं, तबसे ही उन्हें सही सीख दें।
-बच्चों के साथ समय बिताएं, उनके मन को समझें।
-बच्चों के साथ रिश्ता इतना खुला हो कि वह हर अच्छी-बुरी चीज आपसे शेयर करें। उन्हें इस बारे में आप सुनिश्चित करें।
– उन्हें सिखाएं कि समाज में लड़का और लड़की के बीच बराबरी है।
– बच्चों को रिजेक्शन और इगो की समस्या से निपटना सिखाएं।
– बच्चों को गुस्सा ज्यादा आता है तो उन्हें इसे कंट्रोल करने की तकनीक बताएं।
– उन्हें बताएं कि हर चीज का हल झगड़ा नहीं है। हालात बिगड़ रहे हैं तो लड़ने के बजाय आसपास से मदद लें।
– अगर पर्सनैलिटी डिसॉर्डर लग रहा है या गुस्सा कंट्रोल नहीं हो रहा तो डॉक्टर की सलाह लें।

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