अमेठी, कन्नौज, आजमगढ़, रामपुर… यूपी में सियासत के हर मजबूत किले ढहाने में जुटी भाजपा

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अमेठी, कन्नौज, आजमगढ़, रामपुर… यूपी में सियासत के हर मजबूत किले ढहाने में जुटी भाजपा

लखनऊः उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में जीत दर्ज कर बीजेपी ने प्रदेश की राजनीति में परिवारवाद और ‘गढ़वाद’ जैसी धारणाओं पर बड़ा प्रहार किया है। हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने किसी विपक्षी पार्टी के मजबूत किले को ढहाने का काम किया हो। बीते सालों में भगवा पार्टी की राजनीति पर गौर करें तो लगता है, बीजेपी चुन-चुनकर सियासत के ऐसे गढ़ों को ढहाने के अभियान में लगी है। आजमगढ़ और रामपुर उसका एक उदाहरण भर है।

भारतीय जनता पार्टी के इस अभियान में सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी को केंद्रीय स्मृति इरानी ने अमेठी में हरा दिया। अमेठी को न सिर्फ कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है बल्कि राजीव और संजय जैसे गांधी परिवार के कई बड़े नाम इस सीट से जुड़े हैं। अमेठी को गांधी परिवार की ही सीट समझा जाता था। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी में नरेंद्र मोदी युग की शुरुआत हो रही थी, तभी पार्टी ने अपने राजनीतिक दांव-पेचों में परंपरागत शैली को दरकिनार कर दिया और विपक्षी पार्टी के बड़े प्रत्याशियों के खिलाफ डमी कैंडिडेट उतारने की बजाय बड़े चेहरों को उतारकर अपने इरादे जता दिए कि अब सियासत में ‘गढ़’ और ‘किले’ जैसी चीजों को इतिहास बनाने की कवायद शुरू कर दी गई है।

अमेठी में राहुल गांधी को हराया
अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ लोकप्रिय अभिनेत्री और पार्टी की वरिष्ठ नेता स्मृति इरानी को उम्मीदवार बनाया गया। इरानी ने अमेठी में जमकर पसीना बहाया। स्थानीय भाषा और परिवेश में जल्दी ढल जाने वाली इरानी वह चुनाव तो हार गईं लेकिन अमेठी के लोगों में उन्होंने अपनी एक छाप जरूर छोड़ दी। यह अगले चुनाव में काम आया, जब साल 2019 में उन्होंने कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ को भेद दिया। अमेठी से राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा।

मुलायम परिवार पर निशाना
बीजेपी ने इसके बाद उत्तर प्रदेश में बेहद प्रभावशाली मुलायम परिवार पर निशाना बनाया। कन्नौज सपा का एक मजबूत गढ़ माना जाता था। कभी यहां से सांसद रहे अखिलेश यादव ने साल 2019 में अपनी पत्नी डिंपल यादव को उम्मीदवार बनाया था। बीजेपी ने सुब्रत पाठक को टिकट दिया और यहां जमकर मेहनत की। नतीजा रहा कि डिंपल यादव चुनाव हार गईं। कन्नौज सीट पर सपा का हारना समाजवादी कुनबे को बड़ा झटका था। यह प्रदेश में उनके गढ़ ढहने की शुरुआत मानी जा सकती है।

इस तरह की जीत से बीजेपी के हौसले बुलंद होने लगे। पार्टी ने अब मुलायम परिवार के बड़े नामों के खिलाफ भी बड़े चेहरे उतारने का फैसला किया। अपने इस अभियान में बीजेपी ने अखिलेश यादव को भी नहीं छोड़ा। अखिलेश की आजमगढ़ सीट पर बीजेपी ने दिनेश लाल यादव निरहुआ को प्रत्याशी बना दिया। निरहुआ के नाम में यादव भी था और वह पूर्वांचल बेल्ट में काफी लोकप्रिय भी थे। निरहुआ तब चुनाव जीत नहीं पाए लेकिन क्षेत्र में अपनी ऊर्जावान सक्रियता से उन्होंने सपा मुखिया को परेशान जरूर कर दिया। वही निरहुआ तीन साल बाद उसी सीट से चुनाव जीतकर सांसद बन गए।

अखिलेश को भी नहीं छोड़ा
बीजेपी ने अखिलेश का पीछा यहीं नहीं छोड़ा। सपा मुखिया ने साल 2022 के विधानसभा चुनाव में जब करहल से विधायकी का चुनाव लड़ने का ऐलान किया तब बीजेपी ने उनके खिलाफ केंद्रीय मंत्री एसपीएस बघेल को खड़ा कर दिया। हालांकि, अखिलेश के आगे बघेल फीके ही रहे और पहले ही राउंड से बढ़त बनाए रखते हुए 66 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से अखिलेश ने उन्हें चुनाव हरा दिया। लेकिन इस पूरे मामले में अखिलेश के खिलाफ केंद्रीय मंत्री को उतारकर बीजेपी ने अपनी मंशा जाहिर कर दी थी।

बीजेपी की नजर कांग्रेस की परंपरागत सीट रायबरेली पर भी थी। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी की जीत में वोटों का अंतर पिछली बार के मुकाबलों में काफी कम रहा। बीजेपी ने रायबरेली से पांच बार की सांसद सोनिया गांधी के खिलाफ उन्हीं के करीबी रहे दिनेश सिंह को चुनाव में उतार दिया। सोनिया गांधी रायबरेली से साल 2004 से चुनाव लड़ रही हैं। हर बार ऐसा हुआ कि सोनिया के खिलाफ विपक्षी पार्टियों ने यहां वॉकओवर ही दिया लेकिन 2019 में बीजेपी ने उनके ही सिपहसालार रहे दिनेश सिंह को उतारकर यह साफ कर दिया कि अब वह किसी भी सियासी ‘गढ़’ या ‘किले’ पर रहम करने वाली नहीं है।

रामपुर-आजमगढ़ में बीजेपी का परचम
ताजा मामला रामपुर और आजमगढ़ उपचुनाव का है। रामपुर सपा के नेता आजम खान का गढ़ माना जाता है। इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि विधायकी के चुनाव में आजम खान जेल से ही चुनाव जीत गए थे। लोकसभा उपचुनाव के दौरान वह सीतापुर जेल से 27 महीनों बाद वापस लौटे थे। उन्होंने अपने ऊपर यूपी सरकार के कथित अत्याचार का हवाला देते हुए भी वोट मांगा लेकिन कुछ काम न आया। बीजेपी ने आखिरकार उनका किला भेद ही दिया।

आजमगढ़ से सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव भी चुनाव लड़ चुके हैं। 2019 में उनके बेटे अखिलेश यादव ने अपने पिता की सीट संभाली। वह यहां से जीते भी लेकिन करहल से विधायक बनने के बाद उन्होंने सीट छोड़ दी। उपचुनाव में अखिलेश के भाई धर्मेंद्र यादव विरासत बचाने उतरे। बीजेपी ने उनके खिलाफ फिर दिनेश लाल यादव निरहुआ को खड़ा कर दिया। स्मृति इरानी की तरह निरहुआ भी हार के बाद आजमगढ़ में मेहनत करते रहे। इसका ही नतीजा रहा कि यादव-मुस्लिम बाहुल्य वाले समाजवादियों के गढ़ में उन्होंने बीजेपी का झंडा लहरा दिया।

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